नपुंसकता के झूठे आरोप क्रूरता के समान और तलाक का आधार

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नई दिल्ली: तलाक के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति के खिलाफ नपुंसकता के झूठे आरोप लगाना क्रूरता के समान है और उस आधार पर तलाक दिया जा सकता है।

इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

बता दें कि महिला ने सुप्रीम कोर्ट से पति पर आरोप लगाने के बाद हुए तलाक के आदेश को रद्द करने की मांग की थी।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और महिला की याचिका को खारिज कर दिया, जिसने अदालत में अपने पति के खिलाफ आरोप लगाया था और उसकी याचिका पर दिए गए तलाक के आदेश को चुनौती दी थी।

दरअसल, दंपति का विवाह यहां जून 2012 में हुआ था। महिला की यह पहली शादी थी, जबकि पुरुष उस समय तलाकशुदा था।

व्यक्ति ने इस आधार पर शादी को समाप्त करने की गुहार लगाई थी कि महिला की कथित तौर पर यौन संबंधों में रूचि नहीं है और विवाह के लिए उसकी अनुमति महिला की कथित मानसिक अवस्था से संबंधित तथ्यों को छिपाकर ली गई।

व्यक्ति ने कहा था कि यदि उसे इन बातों की जानकारी होती तो वह विवाह के लिए कभी राजी नहीं होते।

इसके बाद महिला ने अपनी प्रतिक्रिया में आरोप लगाया कि उसका पति नपुंसकता की समस्या से पीड़ित है और विवाह नहीं चल पाने का असल कारण यही है, इसके अलावा उसके सास-ससुर झगड़ालू हैं और दहेज की मांग करते हैं।

महिला ने यह आरोप भी लगाया कि दहेज मांगने के साथ ही ससुराल वालों ने उसके साथ क्रूरता भरा व्यवहार किया तथा उसके पति ने सास-ससुर के सामने ही उसके साथ बुरी तरह मारपीट की।

महिला ने उच्च न्यायालय से निचली अदालत के तलाक मंजूर करने के आदेश को रद्द करने की मांग की थी तथा वैवाहिक अधिकार बहाल करने की मांग की और कहा कि वह इस वैवाहिक गठजोड़ को बचाना चाहती है।

इस पर उच्च न्यायालय ने कहा कि महिला के आरोपों को निचली अदालत ने विशेषज्ञ की गवाही के आधार पर खारिज कर दिया है।

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि क्रूरता के आधार पर तलाक के आदेश को रद्द कर दिया जाए और उसे आपसी सहमति से तलाक लेने की अनुमति दी जाए। लेकिन उसकी याचिका का उनके पति के वकील प्रभजीत जौहर ने विरोध किया।

पति पर नपुंसकता का झूठा आरोप लगाने को क्रूरता करार देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा एक व्यक्ति को तलाक दिए जाने के फैसले को बरकरार रखा था।

व्यक्ति की पत्नी ने आरोप लगाया था कि वह शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ था।

दिल्ली हाई कोर्ट के जज मनमोहन व न्यायमूर्ति संजीव नरुला सचदेवा की पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि पत्नी द्वारा लगाया गया झूठा आरोप बहुत ही गंभीर है और यह किसी व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाला है।

ऐसे में पारिवारिक अदालत के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। इस तरह से पीठ ने यह कहते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी थी।

नपुंसकता के झूठे आरोप क्रूरता के समान और तलाक का आधार

नई दिल्ली: तलाक के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति के खिलाफ नपुंसकता के झूठे आरोप लगाना क्रूरता के समान है और उस आधार पर तलाक दिया जा सकता है।

इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।

बता दें कि महिला ने सुप्रीम कोर्ट से पति पर आरोप लगाने के बाद हुए तलाक के आदेश को रद्द करने की मांग की थी।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और महिला की याचिका को खारिज कर दिया, जिसने अदालत में अपने पति के खिलाफ आरोप लगाया था और उसकी याचिका पर दिए गए तलाक के आदेश को चुनौती दी थी।

दरअसल, दंपति का विवाह यहां जून 2012 में हुआ था। महिला की यह पहली शादी थी, जबकि पुरुष उस समय तलाकशुदा था।

व्यक्ति ने इस आधार पर शादी को समाप्त करने की गुहार लगाई थी कि महिला की कथित तौर पर यौन संबंधों में रूचि नहीं है और विवाह के लिए उसकी अनुमति महिला की कथित मानसिक अवस्था से संबंधित तथ्यों को छिपाकर ली गई।

व्यक्ति ने कहा था कि यदि उसे इन बातों की जानकारी होती तो वह विवाह के लिए कभी राजी नहीं होते।

इसके बाद महिला ने अपनी प्रतिक्रिया में आरोप लगाया कि उसका पति नपुंसकता की समस्या से पीड़ित है और विवाह नहीं चल पाने का असल कारण यही है, इसके अलावा उसके सास-ससुर झगड़ालू हैं और दहेज की मांग करते हैं।

महिला ने यह आरोप भी लगाया कि दहेज मांगने के साथ ही ससुराल वालों ने उसके साथ क्रूरता भरा व्यवहार किया तथा उसके पति ने सास-ससुर के सामने ही उसके साथ बुरी तरह मारपीट की।

महिला ने उच्च न्यायालय से निचली अदालत के तलाक मंजूर करने के आदेश को रद्द करने की मांग की थी तथा वैवाहिक अधिकार बहाल करने की मांग की और कहा कि वह इस वैवाहिक गठजोड़ को बचाना चाहती है।

इस पर उच्च न्यायालय ने कहा कि महिला के आरोपों को निचली अदालत ने विशेषज्ञ की गवाही के आधार पर खारिज कर दिया है।

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि क्रूरता के आधार पर तलाक के आदेश को रद्द कर दिया जाए और उसे आपसी सहमति से तलाक लेने की अनुमति दी जाए। लेकिन उसकी याचिका का उनके पति के वकील प्रभजीत जौहर ने विरोध किया।

पति पर नपुंसकता का झूठा आरोप लगाने को क्रूरता करार देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा एक व्यक्ति को तलाक दिए जाने के फैसले को बरकरार रखा था।

व्यक्ति की पत्नी ने आरोप लगाया था कि वह शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ था।

दिल्ली हाई कोर्ट के जज मनमोहन व न्यायमूर्ति संजीव नरुला सचदेवा की पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि पत्नी द्वारा लगाया गया झूठा आरोप बहुत ही गंभीर है और यह किसी व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाला है।

ऐसे में पारिवारिक अदालत के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। इस तरह से पीठ ने यह कहते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी थी।

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