केवल एक जांच रिपोर्ट को सही मान लेना आपको खतरे में डाल सकता है! क्लिक कर पढ़ें ये रिपोर्ट

केवल एक जांच रिपोर्ट को सही मान लेना आपको खतरे में डाल सकता है! क्लिक कर पढ़ें ये रिपोर्ट

डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: दुनियाभर में ऐसे कई मरीज सामने आए हैं जिन्हें खांसी, सांस में तकलीफ और तेज बुखार जैसे कोविड-19 के लक्षणों से जूझ रहे थे और जब जांच कराई तो रिपोर्ट निगेटिव आई बाद में संक्रमित पाए गए।

कोरोना की रिपोर्ट निगेटिव आ जाए इसका मतलब ये नहीं की आप संक्रमित नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे कई मामले आ चुके हैं जिसमें रोगी संक्रमित तो था लेकिन शुरुआती जांच में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी।

डॉक्टरों ने ऐसे मरीज़ को घर में रहने की सलाह दी और लक्षण बढ़ने पर दोबारा आने को कहा। कुछ दिन बाद हालत ज्यादा खराब होने लगी तो फिर डॉक्टरों का रुख किया। डॉक्टरों ने इनकी दोबारा जांच के लिए सैंपल ले लिया और जब थोड़े समय बाद रिपोर्ट आई तो वह भी निगेटिव निकली।

इसका एक कारण सैंपल लेते वक्त नाक के बहुत भीतर से नासिक स्राव लेना होता है। इसके लिए स्वॉब को नाक में कई देर घुमाना भी होता है। कमजोर तकनीक भी ‘फॉल्स निगेटिव’ का कारण हो सकती है। 

दरअसल, ऐसे मामले जो पहले निगेटिव थे फिर पॉजिटिव पाए गए या संक्रमित थे लेकिन उनकी जांच रिपोर्ट निगेटिव आई उन्हें फॉल्स निगेटिव कहा जाता है।

जब कोई निगेटिव पाया जाता है तो इसका मतलब ये हो सकता है

फिलहाल प्रचलित कोरोना जांच पद्धति से संभव है कि संक्रमण पकड़ में न आए। अभी पॉलीमेरेज चेन रिएक्शन यानी आरटी-पीसीआर से जांच हो रही है। इसके जरिए संक्रमण की शुरुआत में सांस में मौजूद वायरस कणों को पकड़ा जाता है। अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का कहना है कि कई दफा जब कोई निगेटिव पाया जाता है तो इसका मतलब ये हो सकता है कि सैंपल लेते वक्त संक्रमण शुरू नहीं हुआ हो।

कई देशों में डॉक्टरों ने अंदेशा जाहिर किया है

ऐसी स्थिति में आपको जांच तो यह बता देगी कि आप संक्रमित नहीं हैं लेकिन संबंधित बीमारी के लक्षण मौजूद हो सकते हैं। कोरोना के मद्देनजर ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। दुर्भाग्यवश ऐसे लोगों का कोई डाटा भी नहीं जुटाया जा रहा है। चीन के विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संक्रमितों में 30 फीसदी फॉल्स निगेटिव भी हो सकते हैं। कई देशों में डॉक्टरों ने अंदेशा जाहिर किया है कि फॉल्स निगेटिव की तादाद ज्यादा भी हो सकती है।

सिर्फ एक जांच पर न करें भरोसा

किसी भी जांच रिपोर्ट का अन्य साक्ष्यों से भी मिलान करना चाहिए। केवल एक जांच रिपोर्ट को सही मान लेना खतरे में डाल सकता है। अन्य डॉक्टरों से भी परामर्श कर जांच परिणामों की अपने लक्षणों से तुलना करानी चाहिए। यह मानकर चलें कि हम में से कोई भी संक्रमित हो सकता है, भले ही जांच रिपोर्ट निगेटिव आए।

चीन में ऐसे संक्रमित जिन्हें लक्षण महसूस ही नहीं होता था

कोरोना की चपेट में 80 फीसदी लोग उन लोगों की वजह से आते हैं जिन्हें खुद में वायरस के होने का लक्षण पता ही नहीं होता। शंघाई स्थित जियाओ टॉन्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोध में वैज्ञानिकों को ये भी पता चला है कि औसतन 3.8 दिन में एक व्यक्ति दूसरे को संक्रमित करता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस को जड़ से खत्म करने के लिए आइसोलेशन के साथ बड़े पैमाने पर जांच की जरूरत है जिससे वायरस को पकड़ा जा सके जो लोगों में तो है लेकिन उनको इसका अहसास नहीं होता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि जब तक पहले संक्रमित की पहचान होती है तब तक दूसरा व्यक्ति उससे संक्रमित हो चुका होता है। वुहान के मरीजों पर हुए अध्ययन में पता चला है कि अधिकतर ऐसे लोगों से संक्रमित हुए जो पूरी तरह स्वस्थ दिख रहे थे लेकिन संक्रमित थे।


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