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Saturday, February 27, 2021
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दो तिहाई भारतीय तिब्बत के हक के लिए चीन से संबंध बिगड़ने का जोखिम उठाने को तैयार

नई दिल्ली: अधिकतर भारतीय तिब्बत में मानवाधिकारों के मुद्दे पर चीन के साथ बिगड़ते संबंधों का जोखिम लेने को तैयार हैं। आईएएनएस सी-वोटर तिब्बत पोल के निष्कर्षो में यह बात सामने आई है।

यह इस सर्वेक्षण की सबसे महत्वपूर्ण खोज है। सर्वे के अनुसार, लगभग दो-तिहाई भारतीय चीन के साथ बिगड़ते रिश्ते की कीमत पर भी तिब्बत के मुद्दे का समर्थन करना चाहते हैं।

भारतीयों में पिछले एक साल के दौरान चीन के प्रति बेरुखी में इजाफा हुआ है और अधिकांश भारतीयों की धारणा चीन विरोधी बन गई है।

हालांकि तिब्बत में मानव अधिकारों की स्थिति पर सर्वे में शामिल उत्तरदाताओं को विस्तृत जानकारी नहीं है, मगर इसके बावजूद लोग चाहते हैं कि तिब्बत में मानवाधिकारों की स्थिति भारत सरकार कड़ा रुख अपनाए।

अधिकांश भारतीयों ने कहा कि वे तिब्बत में चीन द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार के उल्लंघनों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं।

अन्य सर्वेक्षणों ने दर्शाया कि इनमें से अधिकांश सामान्य रूप से उइगर क्षेत्र और हांगकांग में मुस्लिमों के मानव अधिकार उल्लंघनों के बारे में जानते हैं, जो इस मुद्दे और अंतर्राष्ट्रीय सूचना अभियानों के बेहतर मीडिया कवरेज का संकेत देता है।

अन्य सर्वेक्षणों से पता चलता है कि उनमें से अधिकांश सामान्य रूप से उइगर क्षेत्र और हांगकांग में मुसलमानों के मानव अधिकार उल्लंघन के बारे में जानते थे, जो इस मुद्दे और अंतर्राष्ट्रीय सूचना अभियानों के बेहतर मीडिया कवरेज का संकेत देते थे।

हालांकि यह भी विडंबना है कि विश्व स्तर पर तिब्बत के मुद्दे को उइगर या हांगकांग के मुद्दे जितनी तवज्जो नहीं दी गई है और इसका पर्याप्त रूप से उल्लेख नहीं किया गया है।

कश्मीर में मध्यस्थता के बिल्कुल विपरीत, ज्यादातर संगठन तिब्बत पर चुप हैं।

प्रत्येक तीसरे भारतीय को लगता है कि वे इस मोर्चे पर पर्याप्त कार्य नहीं हुआ है।

सर्वेक्षण में शामिल दो तिहाई उत्तरदाता दलाई लामा को आधुनिक भारत के एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रभावशाली के तौर पर स्वीकार करते हैं।

 यही नहीं इनमें से बड़ी संख्या में लोग दलाई लामा को एक विदेशी के बजाय भारतीय आध्यात्मिक नेता के तौर पर मानते हैं।

एक तरफ तो इसे समावेश के तौर पर एक महान उपलब्धि माना जा सकता है, लेकिन दूसरी ओर इससे यह भी पता चलता है कि चीन के मोर्चे पर आक्रामक नहीं होने से दलाई लामा की तिब्बती ब्रांड पहचान कमजोर हो गई है।

यही नहीं सर्वे में शामिल लोग अधिकतर लोग चाहते हैं कि दलाई लामा को सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए।