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Wednesday, April 14, 2021
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सिंधु बॉर्डर डीसीपी ने हाथ जोड़कर और गले मिलकर प्रदर्शनकारियों को हटाया

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नई दिल्ली: सिंधु बॉर्डर पर किसान आंदोलन के 13वें दिन किसान संगठनों द्वारा आहूत भारत बंद का कोई खास असर नहीं रहा।

भारत बंद को देखते हुए बॉर्डर पर पुलिस अधिकारियों ने बीती रात को ही रणनीति तय बनाकर पुलिस फोर्स को तैनात कर दिया था। बॉर्डर पर हरियाणा बॉर्डर से सटाकर बेरिकेड्स की तीन लेयर बना दी थी।

साथ ही रस्सी लगाकर उसके पास ही लोहे की चादर से बेरिकेटिंग कर दी थी।

किसी को भी उस एरिया में आने की इजाजत नहीं थी। जिला पुलिस उपायुक्त गौरव शर्मा व अन्य पुलिस अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा के लिहाज से यह सब किया गया है। जिससे शरारती तत्व गड़बड़ नहीं फैला सके।

बॉर्डर से सटी कुछ दुकानों को करवाया गया बंद

सिंघु बॉर्डर, नरेला व आसपास के इलाके में अधिकतर दुकानें खुली रही जबकि कुछ दुकानें बंद रहीं। किसान आंदोलनकारियों ने कुछ दुकानों को बंद भी करवाया था लेकिन उन्होंने बाद में दुकानें खोल ली थी।

उनका कहना था कि दुकान से हर रोज हजार रुपये ही कमाते हैं जिसको बंद कर देगें तो हम और हमारा परिवार क्या खाएगा। इनकी लड़ाई सरकार से है तो हम से जबरदस्ती क्यों।

दहशत के कारण उन्होंने बंद की है जबकि दुकान खोलने वालों का कहना है कि पहले से लॉकडॉउन ने कमर तोड़ रखी है, अब दुकान बंद कर देंगें तो परिवार का पालन कैसे करेंगे।

पहले लॉकडॉउन में और अब भारत बंद में कारोबार हुआ चौपट

बॉर्डर से सटी एक मिठाई की दुकान चलाने वाले पवन कुमार ने बताया कि पिछले 9 माह से कोरोना व लॉकडाउन ने कारोबार को चौपट कर दिया है। दुकान बंद होने के कारण परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था।

किसान भारत बंद के बहाने अबहमारी दुकानें क्यों बंद करा रहे।

किसान अपना काम करें, सरकार से बातचीत कर अपनी समस्या का समाधान निकालें। दुकानें बंद करके लोगों को मुश्किलें क्यों बढ़ा रहे हैं।

अलीपुर में किराने की दुकान चलाने वाले राकेश यादव का कहना है कि उन्होंने दहशत के कारण सुबह दुकान बंद कर दी थी लेकिन दोपहर के करीब दुकान खोल दी।

सुबह कुछ लोग जबरदस्ती दुकानों को बंद करा रहे थे पर दो तीन घंटे बाद अधिकतर दुकानें खुलने लगी। इसके अलावा नरेला, नरेला इंडस्ट्रियल एरिया इलाकों में अधिकतर दुकानें खुली रही।

डीसीपी ने हाथ जोड़कर और गले मिलकर प्रदर्शनकारियों को हटाया

दोपहर करीब दो बजे स्वरूप नगर रिंग रोड पर गुरुद्वारे के सामने अचानक करीब पचास लोग जीप और दोपहिया वाहन से आये और सड़क को पूरी तरह बंद कर दिया। वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पहले बादली एसएचओ आशिष दुबे समेत कई एसएचओ व इंस्पेक्टर पहुंचे। दोनों तरफ से तू-तू मैं-मैं भी हुई।

हालत बिगड़ती देख जिला पुलिस उपायुक्त गौरव शर्मा अपनी टीम के साथ पहुंचे जिनसे कुछ प्रदर्शनकारी भिड़ते हुए भी नजर आए लेकिन उन्होंने काफी समझदारी से प्रदर्शनकारियों को समझाया और उनसे हाथ जोड़कर और गले मिलकर रिंग रोड से हटाया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों एक अच्छे नागरिक होने का फर्ज भी बताया।

उनका कहना था कि प्रदर्शन से आम नागरिक को परेशानी नहीं होनी चाहिए जिसको सभी को ध्यान रखना चाहिए।

सभी प्रदर्शनकारी युवा हैं। उनको सही बात का ज्ञान करवाना जरूरी था। जो हमने किया भी।

उनको इस तरह से गले व हाथ जोड़ता देखकर सड़क पर फंसे लोगों ने सराहना की और उनको धन्यवाद भी किया।

एतिहात के तौर पर वह उस जगह पर आधा घंटा रहे।

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना

किसान आंदोलन में भले ही किसान यह कह रहे हों कि उनका किसी पॉलिटिक्ल पार्टी से वास्ता नहीं हैं लेकिन सियासी दल, समाज सेवी संस्थाएं इसका पूरा फायदा उठा रही हैं।

पिछले 13 दिन से अनगिनत समाज सेवी संस्थाओं के लोग हाथों में बैनर लेकर अपने दर्जनभर साथियों के साथ कारों में आते हैं। अपने साथ एक फोटोग्राफर भी लाते हैं।

ये लोग आंदोलनकारियों के बीच में घूम-घूमकर हाथों में किसान विरोधी कृषि कानूनों के बैनर लेकर नारेबाजी करते हैं। नारेबाजी भी इस स्टाइल से की जाती है कि उनकी फोटो भी अच्छी आए।

फोटोग्राफर को पहले से ही पूरा सीन समझा दिया जाता है। फोटो खींचने के बाद वहीं पर लंगर खाते हैं और कार में बैठकर चले जाते हैं।

आंदोलन से कोई वास्ता नहीं लंगर खाने और सेल्फी खींचवाने आते हैं

आंदोलन को 13 दिन पूरे हो गए हैं। आंदोलन में आने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं,जिनका आंदोलन से कोई मतलब नहीं हैं। बस वो न्यूज चैनलों और यू-ट्यूब में देखकर अपनी अपनी कारों से यहां पर आ रहे हैं।

ऐसे लोगों का मानना है कि यह आंदोलन एक एतिहासिक आंदोलन बन गया है। जिसका हिस्सा वह बनना चाहते हैं।

लेकिन यहां पर अपनी व दोस्तों व परिवार वालों के साथ सेल्फी व फोटो खींचवाकर और लंगर खाकर।

जिसमें ब्रेकफास्ट,लंच और डिनर में लस्सी,खीर,फल,कोल्ड ड्रिंक्स और स्वच्छ पानी मिलता है।

आलम यह है कि लोग यहां पर आकर पैकेट वाली चीजों को बैगों में भर भरकर अपने घर तक ले जा रहे हैं। क्योंकि किसान लोग निस्वार्थ भाव से सभी को खिला पीला रहे हैं।

किसान-प्रभू सिंह पाटियाला वाले

कृषि कानून को लेकर आंदोलनकारी जरूर सरकार का घमंड तोड़ेंगे। भारत बंद के दौरान उनको देशवासियों को पूरा सहयोग मिला है। आंदोलन से होने वाली कुछ परेशानियों को वह दरकिनार करके किसान भाईयों के साथ खड़े हैं।

सरकार जिस तरह से बातचीत को जानबूझकर आगे बढ़ाकर किसान भाईयों को परेशान कर रही है।

वह बर्दाश्त के बाहर हो रहा है। लेकिन हम भी सरकार की तानाशाही को सहन करते हुए किसी भी कीमत पर बिल को वापिस करवाएंगे।

किसान-भीम सिंह पानीपत

आज मेरी उम्र 85 पार हो चुकी है। किसान के लिए सरकारों ने कुछ नहीं किया है। सिर्फ उनकी मजबूरियों पर रोटी ही सेकीं हैं। वह अपने परिवार के साथ बोर्डर पर बिल वापिस करवाने आया हूँ।

हमकों पता है कि बिल पूरी तरह से पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने और कुछ ही सालों में किसानों को निर्धन बनाने का है। वह नहीं चाहता है कि उसके बच्चे व पौते बिल के नीचे दबकर अपनी जमीन खो दें और आत्महत्या कर ले।

यह बिल किसानों के लिए आत्महत्या करने से कम नहीं है।

किसान-नेक सिंह पंजाब

किसान खेती के अपने काम को जारी नहीं रख सकता,अगर उसे अपनी फसल की इतनी कीमत नहीं मिलती जिससे कि वह उत्पादन की लागत पूरी करने के बाद अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ बचा सके।

इसलिए यह समाज का फर्ज बनता है और यह किसान का अधिकार है कि उसे अपने उत्पाद के लिए लाभकारी कीमत मिले। किसानों के इस अधिकार को पूरा करना राज्य का फर्ज है।

जिसके बारे में सरकारें अपने लाभ के लिए सोचती नहीं हैं।

किसान-बलबीर सिंह पंजाब

सरका के कृषि कानून की असलियत यह है कि इन नए कानूनों को मकसद कृषि व्यापार में नीजी बिचौलियों को हटाना नहीं बल्कि उन छोटे व मंझोले आढतियों की जगह पर विशाल कॉपोरेट बिचौलियों,रिलायंस रिटेल,आदित्य बिरला रिटेल,टाटा का स्टार इंडिया,अदानी बिलमार,बिग बाजार,डी मार्ट आदी को लाना है।

जिससे सरकारों की जेब भरे और किसान इनके पैरों तले दबा रहे। इससे कॉपोरेट बिचौलियों की भी जेब भरेगी और वे सरकारों की जेबों को भरेगा।

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