PhD Admissions Controversy : झारखंड हाईकोर्ट में पीएचडी प्रवेश से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया है। कोर्ट ने University के शपथ-पत्र को प्रथम दृष्टया भ्रामक मानते हुए कड़ा रुख अपनाया है।
इस मामले में कोर्ट ने University के रजिस्ट्रार को गुरुवार सुबह 10:30 बजे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।

अदालत का मानना है कि शपथ-पत्र के जरिए कोर्ट को भ्रमित करने की कोशिश हुई है।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद PHD प्रवेश नीति और सीटों के कैरी फॉरवर्ड से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में यदि आरक्षित वर्ग की सीट खाली रह जाती है और उस वर्ग का योग्य छात्र उपलब्ध नहीं है, तो उस सीट को खाली नहीं रखा जा सकता।
ऐसी स्थिति में वह सीट मेधावी सामान्य वर्ग के छात्र को दी जानी चाहिए। यही सिद्धांत Supreme Court और हाईकोर्ट के पुराने फैसलों में भी बताया गया है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने इंटरनेशनल रिलेशंस विभाग में पीएचडी में नामांकन के लिए आवेदन किया था। परीक्षा और इंटरव्यू पास करने के बावजूद उसका चयन नहीं हुआ।

वह सामान्य वर्ग से था, जबकि सामान्य सीट को ओबीसी वर्ग के एक मेधावी छात्र को दे दिया गया। वहीं ओबीसी वर्ग की तीन सीटों को अगले सत्र के लिए कैरी फॉरवर्ड कर दिया गया, जिसे याचिकाकर्ता ने नियमों के खिलाफ बताया।
सीट मैट्रिक्स पर सवाल
याचिकाकर्ता ने 13 नवंबर 2025 के शपथ-पत्र के जरिए यूनिवर्सिटी द्वारा पेश किए गए Seat Matrix को भी चुनौती दी।
इसमें कुल छह सीटें दिखाई गई थीं—SC-1, ST-0, OBC-4, EWS-0 and UR-1। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह मामला आरक्षण नियमों और सीटों के सही इस्तेमाल से जुड़ा है।
कोर्ट की सख्ती
हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश कुमार की अदालत ने यूनिवर्सिटी के शपथ-पत्र को प्रथम दृष्टया “झूठा” मानते हुए रजिस्ट्रार से जवाब मांगा है।
कोर्ट ने साफ किया कि शैक्षणिक संस्थानों को प्रवेश प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता रखनी होगी। इस मामले की सुनवाई अब अगले चरण में होगी।




