RIMS Poses a Challenge for Patients: झारखंड की राजधानी में स्थित राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) आज खुद गंभीर अव्यवस्था का शिकार नजर आ रहा है।
जिस अस्पताल से प्रदेश के सबसे गरीब और जटिल मरीजों को इलाज की उम्मीद रहती है, वहां इलाज से पहले बेड, पानी, सफाई और सम्मानजनक व्यवहार की तलाश सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

600 करोड़ खर्च, फिर भी बेड की भारी कमी
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार RIMS पर हर साल करीब 600 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। इसके बावजूद 1200 स्वीकृत बेड वाले इस अस्पताल में औसतन 1800 मरीज भर्ती रहते हैं।
अतिरिक्त मरीजों के लिए न तो Bed उपलब्ध हैं और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था, जिससे मरीजों को फर्श, गलियारों और Stretcher पर इलाज कराना पड़ता है।
गंदगी और टूटी सुविधाएं बढ़ा रहीं खतरा
अस्पताल परिसर में चारों ओर गंदगी फैली है। कई जगह फर्श टूटी हुई और गलियारे असमतल हैं, जिससे स्ट्रेचर फिसलने का खतरा बना रहता है।
दीवारों पर उगे पीपल के पेड़ भवन की मजबूती के लिए खतरा बन चुके हैं। कई मंजिलों के बाथरूम लंबे समय से बंद हैं और खुले कचरे के ढेरों में इस्तेमाल की गई सिरिंज व Medical Waste साफ दिखता है।

पानी और वॉर्ड बॉय की कमी
पीने के पानी की स्थिति भी बेहद खराब है। कई वॉर्डों में वाटर फिल्टर खराब हैं, कहीं नल सूखे पड़े हैं तो कहीं पानी की आपूर्ति ही नहीं हो रही।
मजबूरी में मरीजों और उनके परिजनों को बाहर से पानी खरीदना पड़ता है। वॉर्ड बॉय की कमी के कारण मरीजों को स्ट्रेचर पर लाने-ले जाने का काम परिजन खुद करते हैं।
इलाज कम, रेफरल ज्यादा
रोजाना दो से ढाई हजार मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं और 300 से 400 नए मरीज भर्ती होते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक जांच सुविधाओं की कमी के कारण गंभीर मरीजों को निजी अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।
सरकारी अस्पताल से निजी अस्पताल भेजा जाना गरीब मरीजों के लिए आर्थिक सजा बन जाता है।
सवालों के घेरे में व्यवस्था
न्यूरो सर्जरी विभाग में 120 बेड के मुकाबले 200 से अधिक मरीज भर्ती हैं। सर्जरी के बाद भी मरीज जमीन पर पड़े रहते हैं, जहां संक्रमण का खतरा हमेशा बना रहता है।
सवाल यह है कि जब 600 करोड़ का Budget भी बेड, सफाई और सम्मानजनक इलाज नहीं दिला पा रहा, तो क्या रिम्स अस्पताल है या सिर्फ इंतजार और रेफरल की फैक्ट्री?




