
सुशोभित
शिया इस्लाम में 12 इमाम माने गए हैं। हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) पहले इमाम थे। उनके बेटे हज़रत हसन और हज़रत हुसैन दूसरे और तीसरे इमाम हुए। बारहवें इमाम हज़रत महदी पोशीदा माने जाते हैं। यह कि वो भौतिक स्वरूप में उपस्थित नहीं हैं। तब उनकी ग़ैर-मौजूदगी में शियाओं का नेतृत्व कौन करे? यह ज़िम्मेदारी ‘मरजअ’ को सौंपी जाती है। ये इस्लामिक क़ानून (फ़िक़्ह) के आलिम होते हैं।
इस पसे-मंज़र में आपको मालूम होना चाहिए कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला ख़ुमैनी और अली ख़ामेनेई- दोनों ही राष्ट्राध्यक्ष होने के साथ ही ‘मरजअ’ भी थे। अयातुल्ला ख़ुमैनी ने ‘विलायते-फ़क़ीह’ की अवधारणा प्रस्तुत की थी, जिसके चलते बारहवें इमाम की ग़ैर-मौजूदगी में वो फ़िक़्ह के आलिम और मरजह होने के नाते ट्वेल्वर-शिया पंथ का नेतृत्व करेंगे। इन मायनों में ईरान के सर्वोच्च नेता केवल उस मुल्क के ही नहीं, दुनिया के शियाओं के भी लीडर होते हैं। मैंने शियाओं की मजलिसें देखी हैं और उनमें ख़ुमैनी और ख़ामेनेई की तस्वीरें दीवारों पर चस्पा पाई हैं।
साम्राज्यवादी अमेरिका और ज़ायोनिस्ट इज़राइल की फ़ौजों द्वारा अली ख़ामेनेई का क़त्ल करने के बाद हिन्दुस्तान के जम्मू-कश्मीर और लखनऊ में शियाओं ने जिस तरह से सड़कों पर उतरकर सोग़ मनाया है, उसे इसी परिप्रेक्ष्य से समझा जाना चाहिए। आप इन लोगों पर ग़द्दार या ग़ैर-वतनपरस्त होने का इल्ज़ाम नहीं लगा सकते। यों भी, ईरान की हुकूमत के साथ हिन्दुस्तान की कोई लड़ाई नहीं थी। उलटे अतीत में हमने उनसे चाबहार पोर्ट आदि के क़रारनामे किए थे। हिन्दुस्तान के वज़ीरे-आज़म अभी ज़रूर इज़राइल के लीडर से मिलकर आए थे, लेकिन वो तो उसी गर्मजोशी से चाइना और रशिया के लीडरान से भी मिल आते हैं, उसमें कुछ ख़ास बात नहीं है। लेकिन शियाओं के लिए ये सोग़ और मातम का दिन है। सोग़ तो इस क़ौम की तक़दीर में ही लिक्खा है। जंगे-सिफ़्फ़ीन इनके लिए ख़त्म होने का नाम नहीं लेती। करबला चलता ही रहता है। हज़रत अली और उनके दोनों बेटे शहीद हुए थे। अली ख़ामेनेई की शहादत शिया-इतिहास में आत्मबलिदानों की कड़ी में अगला अध्याय है।
और इसे शहादत के सिवा कुछ और कहा नहीं जा सकता। ईरान के लीडर चाहते तो अमरीकी-आधिपत्य स्वीकार सकते थे, उसके साथ तेल का धंधा कर सकते थे, उसके रणनीतिक-सहयोगी बन सकते थे, जैसे अरब के सुन्नियों ने किया है। जहाँ एक तरफ़ सऊदी अरब के ज़िम्मेदार लोग जैफ्री एप्स्टीन सरीखे नरपिशाच को पवित्र काबा का किस्वा तोहफ़े में दे रहे थे और वो उसे फ़र्श के किसी कालीन की तरह वापर रहा था, वहीं ईरान और उसके लीडरान ने खुलकर अमरीका-इज़राइल गठजोड़ का मुक़ाबला किया। इतिहास के पन्ने उलटकर देखें तो अमरीका ने दुनिया के बीसियों मुल्कों में सत्ता-परिवर्तन करवाया है, वहाँ के लीडरों को या तो उठवा लिया है, या क़त्ल करवा दिया है, या उस मुल्क में दंगे-बग़ावत-फ़ित्ने भड़कवा दिए हैं। हिन्दुस्तान में भी जब इंदिरा गांधी विप्लवों के पीछे ‘विदेशी हाथ’ होने की बात करती थीं, तो उनका इशारा अमरीकी हाथ की तरफ़ होता था।
अमरीका की ये शैतानी पूँजीवादी रिजीम दुनिया के हर कोने में अपने हथियार-असलहे बेचती है, सबको लड़वाती है, सबका ख़ून चूसती है और सब पर दादागिरी करती है। अली ख़ामेनेई साहब को मालूम था कि अमरीका से भिड़ने का अंजाम क्या होता है, लेकिन वो निडर होकर अडिग रहे। यों भी, क़ुरबानी शियाओं के ख़ून में है। वो मिसाल है ना- “इस्लाम ज़िन्दा होता है हर करबला के बाद…”
बहरहाल, इस नुक़्ते पर मैं ज़रूर ज़ोर देना चाहूँगा कि शैतानी ताक़तों से लड़ने के लिए जैसे शैतानी तौर-तरीक़े आपको अख्तियार करने पड़ते हैं, वो ही अली ख़ामेनेई ने हिज़बुल्ला-हूती-हमास के नेटवर्क को बुलन्द करके किया। मैं इन दहशतगर्दी तंज़ीमों का समर्थन नहीं करता, लेकिन ये जंग उन पर अमरीकियों-ज़ायोनिस्टों ने थोपी थी, इस हक़ीक़त से मुँह भी नहीं फेर सकता। क्या ईरान की अवाम फिर से शाह के राज को चाहती है और क्या वो 1979 में क़ायम हुई जम्हूरे-इस्लामी से ख़ुश नहीं थी- ये उनके अंदरूनी सवालात हैं। ईरान की अवाम इस हुकूमत के खिलाफ़ लगातार आन्दोलन-प्रदर्शन कर रही थी। क्योंकि वहाँ औरतों के हुक़ूक़ कुचले जा रहे थे। डेमोक्रेसी नाममात्र की थी। थियोक्रेटिक हुकूमत में धर्मगुरुओं के हाथ में सत्ता थी। सुना है अली ख़ामेनेई के क़त्ल के बाद ईरान में कुछ लोग जश्न मना रहे हैं और कुछ लोग सोग़। अलबत्ता ये भी उनका अंदरूनी मामला है।
लेकिन अमरीका को नैतिकता का इकलौता, स्वघोषित पुतला और पैरोकार बनकर और किसी मुल्क में घुसकर उसके लीडर को मार डालने, उसे उठवा लेने, वहाँ हुकूमतें बदलवा देने का कोई हक नहीं है, ख़ासतौर पर तब, जब वो ख़ुद अंदरूनी मोर्चों पर अनेक सवालों का सामना कर रहा है। शीतयुद्ध के दिनों में सोवियत यूनियन अमरीका के सामने ताक़त का संतुलन क़ायम करती थी। आज चाइना-रशिया धुरी है। मध्यपूर्व में ईरान था, जिसका एक स्तम्भ आज ढह गया है। चाइना-रशिया-ईरान ख़ुद नेकी के पुतले नहीं रहे हैं, लेकिन दुनिया में ताक़त का संतुलन क़ायम रहना भी ज़रूरी है। आग को पानी और पानी को आग का डर बना रहना चाहिए। हर मुल्क का लीडर डरपोक, दब्बू, डीलर होगा तो दुनिया कैसे चलेगी?
अली ख़ामेनेई की थियोक्रेसी से मैं भले सहमत ना होऊँ- एक धुर-एथीस्ट होने के नाते- लेकिन अपने असूलों पर वो जिस तरह से टिके रहे, अमरीका से सौदेबाज़ी नहीं की, झुके नहीं, सर को बुलन्द रखा और अपने मुल्क को सरमायेदारों के हाथों बेच नहीं दिया, उनकी शख्सियत में जिस तरह का आभामण्डल था, गरिमा थी, उस सबकी मैं इज़्ज़त करता हूँ। दुनिया में अमन क़ायम रहे, इससे बढ़कर तो कोई दुआ मैं आज कर नहीं सकता, भले जानता होऊँ कि मैं दुआ करूँ भी तो किससे, जब कोई ख़ुदा नहीं है!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
