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चुनाव आयोग को लेकर बढ़ी सियासी हलचल, ममता बनर्जी के रुख पर नजर

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New Delhi : देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तल्खी चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के प्रति बढ़ती नजर आ रही है। सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी ने संकेत दिए हैं कि यदि संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है, तो वह उसका समर्थन कर सकती हैं। हालांकि, उन्होंने अभी इस पूरे मामले में अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं।

 कांग्रेस और राहुल गांधी की भूमिका

ममता बनर्जी ने साफ किया है कि अगर कांग्रेस या राहुल गांधी इस तरह का प्रस्ताव लाने पर विचार करते हैं, तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस विषय पर पार्टी के अंदर चर्चा करेगी। इसके बाद ही कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट होने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

 सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर चुप्पी

सूत्रों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट जाने के सवाल पर ममता बनर्जी ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। उन्होंने इस पर कोई सीधा बयान नहीं दिया है। इसी वजह से राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं कि आगे क्या कदम उठाया जाएगा। विपक्ष के बीच यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या CEC को हटाने की प्रक्रिया सच में आगे बढ़ेगी।

 संविधान क्या कहता है?

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने जैसी ही मानी जाती है। यह प्रक्रिया काफी जटिल होती है। महाभियोग लाने के लिए यह जरूरी है कि CEC पर दुर्व्यवहार या अक्षमता जैसे गंभीर आरोप साबित किए जाएं। बिना ठोस आधार के यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती।

 महाभियोग के लिए जरूरी संख्या

अगर लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है, तो इसके लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। वहीं, राज्यसभा में यह संख्या कम से कम 50 सांसदों की होनी चाहिए। प्रस्ताव लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा चेयरमैन को सौंपा जाता है। उनके पास प्रस्ताव को स्वीकार या खारिज करने का अधिकार होता है। अगर प्रस्ताव खारिज हो जाता है, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है।

जांच और मतदान की प्रक्रिया

यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक कानूनी विशेषज्ञ शामिल होते हैं। अगर जांच समिति CEC को दोषी ठहराती है, तो रिपोर्ट संसद में रखी जाती है। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा में मतदान होता है।

 विशेष बहुमत की जरूरत

CEC को हटाने के लिए दोनों सदनों में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। दोनों सदनों से एक ही सत्र में प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। अंत में राष्ट्रपति आदेश जारी कर CEC को पद से हटाते हैं।

कुल मिलाकर, चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक माहौल गरम है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर देश की राजनीति और तेज हो सकती है।

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