सम्राट चौधरी : क्यों होने चाहिए बिहार के अगले मुख्यमंत्री!

Neeral Prakash
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नीतीश कुमार के बाद बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले की तुलना उनसे होगी, इसलिए जो भी अगले मुख्यमंत्री होंगे, उनके आगे बड़ी लकीर से आगे निकलने की चुनौती होगी। नीतीश जी उस राजनीतिज्ञ का नाम है, जिन्होंने अगड़े और महादलित दोनों को अपने घाट पर साथ में पानी पीने को राजी कर दिया। उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग के साथ बिहार के विकास को अपना एकसूत्रीय एजेंडा रखा।

इस मामले में सम्राट चौधरी अनुभवी व ऊर्जावान नेता हैं। वह बीते 2024 से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की परछाई की तरह रहे हैं और उपमुख्यमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया है। चाहे वह वित्त मंत्री की भूमिका में रहे हों या मौजूदा गृह मंत्री की भूमिका में।

बिहार की राजनीति में सम्राट जी पिछले 30 वर्षों से सक्रिय हैं। उनका राजनीतिक कैरियर 1995 में समता पार्टी से शुरू हुआ और 1999 में उनको बिहार सरकार का मंत्री बनने का मौका मिला। सम्राट जी ने राबड़ी देवी, जीतनराम मांझी, नीतीश कुमार जैसे तीन अलग-अलग मुख्यमंत्री के मंत्रिपरिषद में काम किया है। राजनीति में ऐसा लचीलापन अद्वितीय गुण है।

बिहार में सम्राट चौधरी के पॉलिटिकल मेंटॉर उनके पिता व समतावादी नेता शकुनी चौधरी, दिग्गज लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार रहे हैं। इस विविधता ने बिहार जैसे सोशल कंप्लेक्सिटी वाले प्रदेश में सम्राट जी को परिस्थितियों से डील करना अच्छी तरह सिखाया है। सम्राट जी मंडल और कमंडल दोनों राजनीति को साधने की कला जानते हैं।

यही कारण है कि कुछ समय के लिए विपक्ष में रहते हुए नीतीश जी के खिलाफ बहुत आक्रामक होने के बावजूद सम्राट जी उपमुख्यमंत्री बनने पर नीतीश कुमार जी के दिल में जगह बनाने में कामयाब हुए। सम्राट जी ने कभी नीतीश जी को ओवरटेक करने का प्रयास नहीं किया।

किसी भी टास्क को पूरा करने में सम्राट जी अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं। भाजपा नेतृत्व ने उनको ऐसे ही आगे नहीं बढ़ाया है। जिम्मेदारी मिलने पर सम्राट जी ने डिलीवर करके भी दिखाया है। 2025 के विधानसभा चुनाव के दौरान यदि सबसे ज्यादा किसी पर निजी हमले हुए, तो वह सम्राट चौधरी थे। उन हमलों के बावजूद वह बड़े अंतर से चुनाव जीते।

सम्राट चौधरी की ऊर्जा और आक्रामक शैली उन्हें नयी पीढ़ी के बीच आकर्षक बनाती है। बिहार की कुछ राजनीतिक जातियों के युवाओं को छोड़ दें, तो बाकी युवाओं के बीच सम्राट जी लोकप्रिय नेता हैं।

बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री पद के लिए अभी ओबीसी पहचान इसलिए जरूरी है, क्योंकि सामाजिक न्याय की जो धारा यहां से शुरू हुई है, उसकी पूर्णाहुति बाकी है। ऐसे में सम्राट चौधरी पिछड़े वर्ग की बिहार की दूसरी सर्वाधिक आबादी वाली जाति कुशवाहा (कोइरी) जाति से आते हैं। जिसे अब तक बिहार की राजनीति के सर्वोच्च कुर्सी पर उचित भागीदारी नहीं मिली है।

कुशवाहा जाति उसी लव-कुश (कुर्मी-कोइरी, धानुक, दांगी, माली, गंगोत्री, केवर्त) राजनीतिक समूह का हिस्सा है, जिस समूह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं आते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सीएम की कुर्सी छोड़ने के बाद भी यह सामाजिक समूह खुशी-खुशी इनको स्वीकार कर लेगा। इस समूह की बिहार में कुल आबादी 11 प्रतिशत से ज्यादा है।

सम्राट चौधरी भाजपा के लिए एड ऑन की भूमिका में रहे हैं। उनके रहने से भाजपा में वोट जुड़ता है। वह भाजपा के साथ पिछड़ा, अति-पिछड़ा और युवा वर्ग को जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक होता है। गठबंधन के सहयोगी दलों जदयू, लोजपा, हम के बीच सम्राट जी कहीं अधिक स्वीकार्य हैं।

सम्राट चौधरी भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, जिससे संगठन व कार्यकर्ताओं से भी इनके अच्छे रिश्ते हैं।

30 वर्षों के राजनीतिक जीवन में इन पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है। नटवरलाल ने जो भी निजी आरोप चुनाव के समय इन पर लगाये थे, वह इनके राजनीतिक जीवन शुरू होने से पूर्व के थे और उन पर न्यायालय तक के फैसले आ चुके हैं। जनता की अदालत ने तो खैर और अच्छे से फैसला दे दिया।

नीतीश जी, सम्राट जी को मानते हैं। ऐसे में सम्राट जी, निशांत कुमार व अन्य के साथ बिहार की कमान मजबूती से संभालें और बिहार की जनता से जो वादे किये गये हैं, उसको पूरा भी करें।

उम्मीद है कि भाजपा नेतृत्व ने जिस तरह से अब तक सम्राट जी पर भरोसा जताया है, आगे भी जतायेगी।

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