त्रिपुरा में लेफ्ट के लंबे शासन के दौरान एमएसपी पर क्यों नहीं हुई फसलों की खरीद?

अगरतला: त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव ने पूछा है कि त्रिपुरा में 25 वर्षों से अधिक समय के वाम शासनकाल में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान समेत अन्य फसलों को खरीदने की कोई पहल क्यों नहीं की गई।

दरअसल वर्तमान में देश के पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा नये कृषि बिल को लेकर आंदोलन शुरू किया गया है जिसमें एमएसपी को मुख्य आधार बनाया गया है।

मजेदार बात है कि किसानों के इस आंदोलन में सीपीएम समेत वामपंथी पार्टियां भी पूरे जोरशोर से हिस्सा लेते हुए इसका विरोध कर रही हैं।

वामपंथी पार्टियों को लग रहा है कि इस आंदोलन के जरिए शायद उन्हें भी देश के लोग नोटिस करेंगे।

वामपंथी दल सीधे तौर आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। सीपीएम के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सवाल उठाया है।

इसके मद्देनजर मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव ने उनसे सवाल करते हुए पलटवार किया है।

इस बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुख्यमंत्री बिप्लव कुमार देव के ट्वीट को रिट्वीट करते हुए कहा है कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का समय पर एमएसपी के मुद्दे पर पुरानी सरकार के कामकाज को याद दिलाया है, मैं उनको धन्यवाद देती हूं।

उल्लेखनीय है कि त्रिपुरा में सरकार बदलने के बाद राज्य सरकार ने किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान व अन्य फसलों को खरीदने का फैसला किया।

मुख्यमंत्री देव ने तत्कालीन केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान के साथ बैठक की और धान की खरीदारी के समय कीमत तय की गई।

वर्ष 2018 के दिसम्बर में एफसीआई के माध्यम से धान खरीदने के लिए एक पहल की गई थी। एफसीआई ने 15 दिसम्बर, 2018 को 17.70 रुपये प्रति किग्रा की दर से धान खरीदना शुरू हुआ था।

पहले चरण में एफसीआई ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दो किश्तों में त्रिपुरा के किसानों से 26870 मीट्रिक टन धान की खरीद की।

अगले चरण में यह राशि बढ़कर 50,000 मीट्रिक टन हो गया। समर्थन मूल्य में भी वृद्धि हुई।

दूसरे चरण में किसानों के लिए धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़कर 18.15 रुपये प्रति किग्रा हो गया। स्वाभाविक रूप से किसानों के आय में अधिक से अधिक बढ़ोत्तरी हुई।

हालांकि, इस तरह की पहल लंबे समय से नहीं की गई थी। त्रिपुरा सरकार को भी एफसीआई के माध्यम से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद के लिए सरकारी खजाने से खर्च करना पड़ा है।

क्योंकि, त्रिपुरा में चावल बनाने के लिए कोई अत्याधुनिक मिल नहीं थी। इसलिए, त्रिपुरा सरकार ने धान से चावल की लागत पर एक अलग नीति बनाई है।

इस संबंध में त्रिपुरा किसान मोर्चा के अध्यक्ष, जहर साहा ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत करते हुए कहा कि सीपीएम किसानों के कल्याण के बारे में कभी नहीं सोचती है।

वामपंथियों ने अपने लंबे शासन के दौरान किसानों को रेगा श्रमिकों में बदल दिया था। क्योंकि, वे किसानों के साथ राजनीति करने के पक्ष में थे।

उनके अनुसार भारत में कृषि क्रांति की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। आज वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उस क्रांति को पूर्ण रूप दिया है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक किसान सम्मान निधि से लेकर किसानों की आय दोगुना करने के लिए एक रूपरेखा तैयार की है।

धान और फसलों का उचित मूल्य तय किया गया है। उन्होंने दावा किया कि कृषि बिल फसलों की कीमतों की रक्षा करेगा।

हालांकि, संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए लोगों को भ्रमित करने के लिए देश के कुछ हिस्सों में कृषि बिल का विरोध किया जा रहा है।

इस बीच त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर वाम दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि कम्युनिस्ट त्रिपुरा में 25 साल से अधिक समय से सत्ता में थे।

हालांकि, 2019 में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के दौरान त्रिपुरा में पहली बार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद की शुरूआत हुई है।

उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि वामपंथी फिर से झूठ फैलाना शुरू कर दिये हैं।

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