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Sammed Shikharji : पारसनाथ पहाड़ी को लेकर नया विवाद, अब आदिवासियों ने किया अपना दावा

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रांची: केंद्र सरकार ने 5 जनवरी को झारखंड में जैनियों के धार्मिक स्थल ‘सम्मेद शिखरजी’ से संबंधित पारसनाथ पहाड़ी पर सभी प्रकार की पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगा दी और झारखंड सरकार को इसकी शुचिता अक्षुण्ण रखने के लिए तत्काल सभी जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिये, लेकिन अब आदिवासी भी मैदान में कूद पड़े हैं और उन्होंने इस इलाके पर अपना दावा जताया है और इसे मुक्त करने की मांग की है।

आदिवासी समुदाय ने दी विद्रोह की चेतावनी

संथाल जनजाति के नेतृत्व वाले राज्य के आदिवासी समुदाय ने पारसनाथ पहाड़ी को ‘मरांग बुरु’ (पहाड़ी देवता या शक्ति का सर्वोच्च स्रोत) करार दिया है और उनकी मांगों पर ध्यान न देने पर विद्रोह की चेतावनी दी है।

देश भर के जैन धर्मावलम्बी पारसनाथ पहाड़ी को पर्यटन स्थल के रूप में नामित करने वाली झारखंड सरकार की 2019 की अधिसूचना को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, उन्हें डर है कि उनके पवित्र स्थल पर मांसाहारी भोजन और शराब का सेवन करने वाले पर्यटकों का तांता लग जाएगा।

सरकार दस्तावेज़ीकरण के आधार पर कदम उठाए- नरेश कुमार मुर्मू

अंतरराष्ट्रीय संथाल परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष नरेश कुमार मुर्मू ने दावा किया, ‘‘अगर सरकार मरांग बुरु को जैनियों के चंगुल से मुक्त करने में विफल रही तो पांच राज्यों में विद्रोह होगा।’’ उन्होंने कहा, ‘हम चाहते हैं कि सरकार दस्तावेज़ीकरण के आधार पर कदम उठाए। (वर्ष) 1956 के राजपत्र में इसे ‘मरांग बुरु’ के रूप में उल्लेख किया गया है।।। जैन समुदाय अतीत में पारसनाथ के लिए कानूनी लड़ाई हार गया था।’’

संथाल जनजाति देश के सबसे बड़े अनुसूचित जनजाति समुदाय में से एक है, जिसकी झारखंड, बिहार, ओडिशा, असम और पश्चिम बंगाल में अच्छी खासी आबादी है और ये प्रकृति पूजक हैं।

10 जनवरी को पारसनाथ में जुटेंगे आदिवासी

झामुमो विधायक लोबिन हेम्ब्रम ने कार्यक्रमों की घोषणा करते हुए कहा कि अपनी धरोहर को बचाने के लिए आदिवासी आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हैं।

10 जनवरी को पारसनाथ में पूरे देश पर के आदिवासी जुटेंगे और बड़ी सभा की जायेगी। मोर्चा ने केंद्र व राज्य सरकार को 25 जनवरी तक अल्टीमेटम दिया है। यदि सरकार ने हमारे मांगे नहीं मानी, तो 30 जनवरी को बिरसा मुंडा की धरती, उलिहातू और दो फरवरी को भोगनाडीह में उपवास पर बैठेंगे।

मौके पर अजय उरांव, एलएम उरांव, सुशांतो मुखर्जी, निरंजना हेरेंज टोप्पो, मरांग बुरु सुसेर बैसी के सिंकदर हेम्ब्रम, बिमवार मुर्मू, संताल समाज के परगना बाबा कुनेराम टुडू, सुरेंद टुडू व अन्य मौजूद थे।

नरेश मुर्मू ने कहा कि आदिवासी इस देश के मूलनिवासी हैं और उनके आने के हजारों साल बाद ही आर्य आये। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं। कुछ सदी पहले जैन मुनी यहां तप करने आये, जिनका निधन हो गया, वहां उनकी समाधि बना दी गयी। पर इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा पारसनाथ ही जैनियों का हो गया।

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