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काठमांडू में चमका झारखंड का नाम! डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’ को मिला मातृभाषा रत्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मान

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रांची: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर झारखंड की भाषा और संस्कृति को वैश्विक मंच पर बड़ी पहचान मिली है। नागपुरी भाषा के जाने-माने साहित्यकार, रंगकर्मी और कठपुतली कलाकार डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’ को नेपाल की राजधानी काठमांडू में मातृभाषा रत्न अंतर्राष्ट्रीय मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। यह सम्मान नेपाल की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन नेपाल द्वारा दिया गया। कार्यक्रम का मकसद नेपाल-भारत के मैत्री संबंधों को और मजबूत करना, देवनागरी लिपि के संरक्षण को बढ़ावा देना और हिंदी-नेपाली जैसी भाषाओं को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाना था।

पाँच देशों की प्रतिभाओं के बीच झारखंड का गौरव

इस अंतर्राष्ट्रीय समारोह में नेपाल और भारत सहित पाँच देशों की करीब एक हजार साहित्यिक और शैक्षिक हस्तियों को मातृभाषा रत्न और मातृभाषा गौरव सम्मान से नवाजा गया। खास बात यह रही कि सम्मान पाने वालों में 17 साल के युवा से लेकर 86 वर्ष के वरिष्ठ रचनाकार तक शामिल थे। इस तरह यह आयोजन अलग-अलग पीढ़ियों को एक मंच पर लाने वाला बना। इसी क्रम में डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’ को उनके साहित्यिक, शैक्षिक और सामाजिक योगदान के लिए प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया।

साहित्य, शिक्षा और लोकसंस्कृति के लिए समर्पित

डॉ. महतो नागपुरी भाषा और लोकसंस्कृति के समर्पित अध्येता, साहित्यकार, पत्रकार और दक्ष कठपुतली कलाकार हैं। यूजीसी-नेट-जेआरएफ, एमफिल, पीएचडी और बीएड जैसी शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ उन्होंने पुस्तकों, शोध-लेखों, पत्र-पत्रिकाओं और लोकमंचों के माध्यम से मातृभाषा संरक्षण को एक आंदोलन का रूप दिया है।
वर्तमान में वे रांची विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और नागपुरी पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े हुए हैं।

संस्था अध्यक्ष ने क्या कहा?

सम्मान समारोह में संस्था के अध्यक्ष आनन्द गिरि मायालु ने डॉ. महतो को बधाई देते हुए कहा कि फाउंडेशन का उद्देश्य प्रतिभाशाली रचनाकारों को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाना है, ताकि उनमें नई ऊर्जा का संचार हो सके। उन्होंने कहा कि डॉ. महतो जैसे लोकप्रिय शिक्षक, संवेदनशील साहित्यकार और लोकधर्मी कलाकार का सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति का सम्मान है। उनकी रचनाएँ समाज को सकारात्मक दिशा देती हैं।

झारखंड में जश्न का माहौल

जैसे ही यह खबर झारखंड पहुंची, साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में खुशी की लहर दौड़ गई। साहित्यप्रेमियों और शुभचिंतकों ने इसे नागपुरी भाषा और झारखंडी अस्मिता के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया।
यह सम्मान केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि मातृभाषा की शक्ति, लोकसंस्कृति की जीवंतता और सीमाओं से परे साहित्यिक एकता का मजबूत संदेश भी है।

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