
सुशोभित
आज कॉमरेड कार्ल मार्क्स की 143वीं पुण्यतिथि है। बीतते समय के साथ, दिन-ब-दिन मार्क्स और प्रासंगिक लगने लगे हैं। जबकि सोवियत-विघटन के बाद तो यह मान लिया गया था कि मार्क्सवाद अब अप्रासंगिक हो गया है। दुनिया ने आर्थिक-उदारवाद को ऐसे अंगीकार किया था, जैसे कोई बंधक बरसों बाद खुली हवा में साँस लेता हो। फ़ुकुयामा ने तब कहा था कि इतिहास का अंत हो गया है। इतिहास से उनका आशय ऐतिहासिक विचारधारा से था। मार्क्स इतिहास के वैज्ञानिक थे।
उनके अनुसंधान का सुफल ऐतिहासिक-भौतिकवाद के रूप में सामने आया था। इसका प्रतिपादन उन्होंने अपने पार्टनर-इन-क्राइम फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ ‘द जर्मन आइडियोलॉजी’ नामक किताब में किया था और तदनुसार इसका सारांश ‘द कम्युनिस्ट मैनिफ़ैस्टो’ में प्रस्तुत किया गया।
वो 19वीं सदी का मध्य था। अब हम 21वीं सदी की एक चौथाई लाँघ चुके हैं। हम स्वीकारते हैं कि मार्क्स ने इतिहास की डायनैमिक्स को जैसे समझा था, वह ठीक-ठीक उसी तरह से रूपायित नहीं हुआ है। कि वह इतना एकरैखिक और प्रेडिक्टेबल नहीं था। किन्तु यह मार्क्सवाद की विफलता नहीं है। यह इस बात की पुष्टि अवश्य है कि पूँजीवाद की क्षमताओं को उन्होंने कम करके आँका था।
‘लोकप्रिय विचारधारा’ और ‘लोकप्रिय संस्कृति’ के कंधे पर चढ़कर पूँजीवाद अपनी विजय-पताका फहराता है, यह हमने पहले 20वीं सदी में यूरोप में देखा था और इसकी उत्तरकथा 21वीं सदी में जारी है। भारत जैसे देश के परिप्रेक्ष्य में ‘लोकप्रिय विचारधारा’ (राष्ट्रवाद) और ‘लोकप्रिय संस्कृति’ (हिन्दुत्व)- ये दोनों मिलकर ‘सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद’ का निर्माण करते हैं। यह सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद अपने मूल स्वरूप में पूँजीपतियों का अनुचर है। ‘कल्चर’ कैपिटलिज़्म की क्रीतदासी है। लेनिन ने कहा था कि साम्राज्यवाद, पूँजीवाद का सबसे विकृत स्वरूप है।
इसका उदाहरण हाल में हमने ग़ाज़ा और ईरान में देखा है। इफ़ लेफ़्ट अनचेक्ड- अगर पूरी तरह से निरंकुश छोड़ दिया जाए- तो पूँजीवाद मानवीय अस्मिता, उसके मूल्यों, प्रकृति, पर्यावरण- सबका शोषक और हत्यारा सिद्ध हो सकता है। इसका प्रतिकार करने की कई व्यवस्थाएँ हैं। मार्क्सवाद उनमें से एक है।
आप कहेंगे किन्तु ऐतिहासिक-भौतिकवाद विफल रहा है। मैं कहूँगा मार्क्सवाद केवल ऐतिहासिक-भौतिकवाद तक सीमित नहीं, यह हमारे समय और समाज का एक क्रिटीक भी रचता है, हमें एक आलोचनात्मक दृष्टि देता है। वो एक ऐसा फ्रैमवर्क है, जो जड़ नहीं है और जिसने स्वयं को अपडेट करने की क्षमता दिखलाई है- ग्राम्शी, बेन्यामिन, जेमेसन, अल्थुसर, पिकेटी आदि के ज़रिये। मार्क्स ने कहा था कि आर्थिक उत्पादन की प्रणालियाँ और उन पर जिनका अधिकार है, वे एक ऐसा आधार (‘बेस’) रचते हैं, जिन पर संस्कृति, राजनीति, धर्म, राज्य, समाज के ‘सुपरस्ट्रक्चर’ निर्मित होते हैं।
शायद पूरी तरह सही न होकर भी यह धारणा बहुत दूर तक सच साबित होती है। इन अर्थों में आज मार्क्सवाद की प्रासंगिकता उसके उस फ्रैमवर्क में है, जो हमें एक दृष्टि देता है। यही वह सजग, आलोचनात्मक जन-दृष्टि है, जिस पर दक्षिणपंथ, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद सबसे पहले प्रहार करना चाहते हैं। ‘दक्षिणपंथी-डमरू’ कोई छोटी-मोटी युक्ति नहीं, जनता को ‘अफीम’ के नशे में सुला देने का बहुत ही अचूक हथियार है। भारत में तो बीते दशक में यह अतिशय सफल सिद्ध हुआ है।
आर्थिक विषमता से लेकर व्यक्ति के एलीनियेशन तक- मार्क्सवादी शब्दावली आज क्रिटिकल थ्योरी, कल्चरल स्टडीज़, उत्तर-आधुनिक अध्ययन की अकादमियों में लगातार गूँजते रहते हैं। संस्कृति, विचारधारा और सत्ता की अंत:क्रियाओं का विश्लेषण मार्क्सवादी-कैनन्स और टूल्स के माध्यम से आज भी किया जाता है। वामपंथ, साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन, औपनिवेशिकता-विरोधी संघर्ष, स्वाधीनता संग्राम, सिविल सोसायटी मूवमेंट्स, वोकीज़्म आदि के ज़रिये मार्क्स के बुनियादी विचार नए-नए रूपों में प्रकट होते रहते हैं।
मार्क्स ने कम्युनिज़्म के जिस ‘प्रेत’ की बात 1848 में ‘द कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो’ की आरम्भिक पंक्तियों में कही थी, वो प्रेत आज भी दुनिया पर मँडला रहा है। इतिहास की मृत्यु नहीं हुई है, वो बस विद्रूप रूपों में घूमकर फिर से हमारे सामने लौट आया है! और यही मार्क्सवादी दर्शन की चिर-प्रासंगिकता की पृष्ठभूमि है।
मानव-मुक्ति (‘इमेन्सिपेशन’) के महास्वप्नद्रष्टा कॉमरेड कार्ल मार्क्स को उनके पुण्य-स्मरण के इस दिन- लाल सलाम!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
