
पलामू: नक्सल मुक्त हो चुका पलामू अब एक नए बदलाव के दौर से गुजर रहा है। नक्सल गतिविधियों पर लगाम लगने के बाद पुलिस ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदलनी शुरू कर दी है। अब तक जहां पुलिस के फोकस नक्सलियों पर था, लेकिन अब नए उभरते खतरों की ओर भी ध्यान दे रही है। नक्सलवाद कम होने के बाद अब इलाके में अफीम और शराब तस्करी का नेटवर्क तेजी से फैलता दिख रहा है। पलामू, गढ़वा और लातेहार में यह एक नई चुनौती बनकर सामने आ रहा है। पुलिस ने अब नार्कोटिक्स रूट्स की पहचान कर उन पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है।
पलामू में नक्सल का खतरा कम जरूर हुआ है, लेकिन अब अपराध का स्वरूप बदल गया है। ऐसे में पुलिस के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं। उसी के मद्देनजर पुलिस भी अपना रणनीति को अपडेट कर रही है। आने वाले समय में नशा तस्करी के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाने की तैयारी है। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि जरूरत पड़ने पर नए पिकेट और कैंप भी बनाए जा सकते हैं, ताकि इस नेटवर्क को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
पिकेट और कैंप की फिर से हो रही समीक्षा
नक्सल गतिविधियों में कमी के बाद अब पुलिस यह तय कर रही है कि किन पिकेट और कैंप की जरूरत है और किन्हें बंद किया जा सकता है। कुछ पिकेट को बंद करने की तैयारी है, जबकि कुछ को ‘शैडो मोड’ में रखा जाएगा। इसी बदलाव के चलते क्षेत्र से सीआरपीएफ की 134 बटालियन को भी हटा दिया गया है। बताते चलें कि इससे पहले भी चार पिकेट बंद किए जा चुके हैं, जबकि गढ़वा और लातेहार में कई पिकेट पहले से ही शैडो मोड में हैं।
कभी सुरक्षा की रीढ़ थे ये कैंप
2007-08 से पलामू रेंज में नक्सल विरोधी अभियान को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर कैंप और पिकेट बनाए गए थे। बूढ़ापहाड़ से लेकर बिहार और छत्तीसगढ़ बॉर्डर तक 70 से ज्यादा कैंप लगाए गए, जिन्होंने नक्सलियों की सप्लाई लाइन को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई।
‘ऑक्टोपस अभियान’ से मिली बड़ी कामयाबी
साल 2022 में बूढ़ापहाड़ इलाके में चलाए गए ‘ऑक्टोपस अभियान’ के दौरान कई नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए थे। इस अभियान ने नक्सलियों की पकड़ को और कमजोर कर दिया।

