दिलों को जीत लेने वाला प्रियदर्शी सम्राट अशोक

Archana Ekka
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विवेकानंद कुशवाहा

इस वर्ष सम्राट अशोक की जयंती, वैसे तो कल यानी 26 मार्च को है, लेकिन बीते सप्ताह भर से चक्रवर्ती सम्राट की जयंती देश के अलग-अलग हिस्सों में मनायी जा रही है। हर वर्ष चैत्र माह की अष्टमी तिथि को अशोक अष्टमी/अशोक जयंती के रूप में मनायी जाती रही है। मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के पोते और सम्राट बिंदुसार के बेटे सम्राट अशोक एकमात्र भारतीय राजा रहे, जिन्होंने अहिंसा का मार्ग अपना कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भारत की सीमा उन क्षेत्रों तक पहुंचीं, जहां तक कभी तलवारों के दम से नहीं पहुंच पायी थी। न ही फिर कभी आगे पहुंच पायी। अखंड भारत के निर्माता सम्राट अशोक ही थे।

दरअसल, कलिंग युद्ध में हुई हिंसा के बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को चुन लिया। जनता तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए उन्होंने शिलालेख खुदवाये। धम्म नीति के तहत लोगों से अहिंसा, सत्य, करुणा को अपनाने का आह्वाहन किया। यात्रियों के लिए रास्ते के किनारे पेड़ लगवाये, कुएं खुदवाये और धर्मशालाएं बनवायी। उन्होंने पशुहत्या पर रोक लगवायी। लोगों के दिलों में सम्राट का भय नहीं, बल्कि सम्राट के प्रति प्रेम का भाव पनपा।
हालांकि, यह भी सत्य है कि सम्राट अशोक ने शिलालेख न खुदवाये होते, तो उनके इतिहास को दबा कर खत्म कर दिया जाता। यानी कहें तो सम्राट अशोक प्रियदर्शी के साथ दूरदर्शी भी थे। सम्राटों के सम्राट को जयंती पर सादर नमन। जय सम्राट।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।