
नई दिल्ली : सशस्त्र बलों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि देश को उन्हें एक साथ दो लड़ाइयां लड़ने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए, जिनमें से एक सीमा पर और दूसरी अपने कानूनी अधिकारों के लिए घर पर। उन्होंने सैनिकों के लिए बेहतर न्यायिक पहुंच की अपील की।
रविवार को लेह में ‘सीजेआई के संबोधन के कुछ बिंदु’ शीर्षक से दिए गए भाषण में जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायपालिका और सशस्त्र बलों के बीच सहजीवी संबंध पर प्रकाश डाला और कहा कि जहां न्यायालय संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हैं, वहीं वे सैनिक ही हैं, जो उन आदर्शों को कायम रखने के लिए आवश्यक परिस्थितियां बनाते हैं। हिमालय के शांत लेकिन दुर्गम परिदृश्य की पृष्ठभूमि में, उन्होंने सैनिकों की बहादुरी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपने संबोधन की शुरुआत की। उन्होंने 1962 के रेजांग ला के युद्ध का विशेष उल्लेख किया और मेजर शैतान सिंह भाटी व 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के 114 सैनिकों के बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा, ‘संविधान अधिकारों, गरिमा, समानता और न्याय की भाषा में बोलता है, लेकिन इन वादों को भारत की जनता के लिए कायम रखने के लिए आपने जो परिस्थितियां बनाई हैं, उसका पूरा श्रेय आपको जाता है।’
