
पुष्यमित्र
यह चुनाव भले ही टीएमसी, डीएमके और लेफ्ट के लिए निराशाजनक हो, मगर कांग्रेस के लिए यह चुनाव अच्छा ही साबित हुआ है।
पांच राज्यों में कांग्रेस को लगभग 100 विधायक मिलने जा रहे हैं। इसमें 58 विधायक पिछले चुनाव से अधिक होंगे। केरल में उसका अपना सीएम होगा। तमिलनाडु में उसे सत्ता में शामिल होने के ऑफर हैं। बंगाल में खाता खुला है।
मगर एक संकेत साफ है। पार्टी बीजेपी के साथ सीधे मुकाबले में जीत नहीं पा रही। असम और पुडुचेरी के नतीजे यही बता रहे।
वहीं क्षेत्रीय दल और वाम के लिए भी संदेश है कि वे कांग्रेस को बेवजह खारिज न करें। विपक्ष की एकजुटता ही उसे जीत दिला सकती है। इस चुनाव में विपक्षी पार्टियां भी आपस में लड़ती रहीं। कम से कम बंगाल में।
दिक्कत यह भी है कि कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष अब तक भाजपा की राजनीति की काट नहीं ढूंढ पाया है। उसकी नाभि पर निशाना लगाने के बदले वह यहां वहाँ भटकता है। बेवजह के और खुद बीजेपी द्वारा गढ़े मुद्दों के जाल में उलझता है। अगर यह मौजूदा विपक्ष नहीं कर पाया तो फिर हर जगह कोई विजय सामने आएगा।
अभी भी कई विरोधी फाउल प्ले की बात करते हैं। मगर सवाल यह है कि यही बात वे वोटरों को क्यों समझा नहीं पाते। अगर आपके मुद्दों से वोटरों को कोई लेना देना नहीं तो आप बस ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स कीजिए। नहीं तो वोटरों के मुद्दों के साथ खड़े होना शुरू करना होगा।
इतिहास, अस्मिता, धर्म, जाति जैसे नॉन इश्यू सत्ता को सूट करते हैं। क्योंकि उन्हें फिर अपने परफॉर्मेंस पर बात नहीं करना पड़ता है। मगर अगर विपक्ष भी इन्हीं में उलझा रहे तो यह रणनीतिक चूक है। पहले बिहार, फिर बंगाल और असम में यही तो हुआ।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

