
असम : मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शुक्रवार को कहा कि असम के चाय बागानों को आदिवासी समाज ने अपने खून-पसीने से सींचा, लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसी समाज को आज हाशिए पर धकेल दिया गया है। उन्होंने कहा कि जिन हाथों ने असम की पहचान गढ़ी, उन्हीं हाथों को अधिकारों से वंचित रखा गया। उन्हें न ज़मीन का हक़ मिला, न शिक्षा में बराबरी और न सामाजिक सम्मान। और ऊपर से अपमान की विरासत मिली। टी ट्राइब कहकर सीमित करना, अधिकार नहीं देना और आज भी कुली जैसे शब्दों से नीचा दिखाना। ये सिर्फ़ शब्द नहीं हैं, यह सदियों के शोषण और उपेक्षा की मानसिकता का प्रतीक हैं। अंग्रेज़ों के दौर में आदिवासी समाज को उनके घरों से दूर लाकर बागानों में झोंक दिया गया, और आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी उनकी स्थिति में मूलभूत बदलाव नहीं आया – यह हमारे लोकतंत्र पर एक गंभीर प्रश्न है। क्या जिन लोगों ने इस धरती की अर्थव्यवस्था को खड़ा किया,उन्हें आज भी अपने अस्तित्व और पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ेगा? मैं यह स्पष्ट कहना चाहता हूं – यह लड़ाई सिर्फ़ राजनीतिक नहीं है, यह सम्मान, पहचान और ऐतिहासिक न्याय की लड़ाई है।समय आ गया है कि आदिवासी समाज को उनका पूरा अधिकार मिले – पहचान भी, सम्मान भी और संवैधानिक हक़ भी। अब चुप्पी नहीं चलेगी। इतिहास के इस अन्याय को हम सबको मिलकर ठीक करना होगा।
