
High Court strict in the case of Missing Son: बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान High Court ने मामले में कुछ अहम तथ्यों के छिपाए जाने की आशंका जताई है।
अदालत ने इस पूरे मामले की जांच करने के लिए चतरा के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया है कि वे मामले की पूरी जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें। यह याचिका अख्तरी खातून की ओर से दायर की गई थी, जिसमें उनके बेटे के लापता होने की शिकायत की गई है।
न्यायाधीशों की खंडपीठ में हुई सुनवाई
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान कोर्ट के निर्देश पर चतरा के एसपी सुमित कुमार अग्रवाल अदालत में उपस्थित हुए।
उन्होंने जानकारी दी कि टंडवा थाना प्रभारी अनिल उरांव और इस मामले के जांच अधिकारी अमित कुमार को विभागीय कार्रवाई के तहत निलंबित कर दिया गया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
अदालत में कई तथ्यों पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान टंडवा थाना के एक कांस्टेबल के पत्र का भी जिक्र किया गया। उस पत्र में कहा गया था कि याचिकाकर्ता के बेटे को उसके मामा मोहम्मद गुलाम के हवाले कर दिया गया था, जो चतरा जिले के सिमरिया थाना क्षेत्र के निवासी हैं।
वहीं अदालत में अख्तरी खातून ने बताया कि उनका बेटा 6 फरवरी 2026 को घर वापस आ गया था। इस दौरान मोहम्मद गुलाम भी अदालत में मौजूद थे और उन्होंने बताया कि याचिका दाखिल करते समय याचिकाकर्ता उनके साथ नहीं बल्कि अपने रिश्तेदार मोहम्मद अब्दुल हकीम के साथ आई थीं।
अगली सुनवाई 19 मार्च को
इस मामले में पूर्व अधिवक्ता भास्कर त्रिवेदी को भी अदालत में बुलाया गया था। उन्होंने भी इस बात की पुष्टि की कि याचिकाकर्ता उनके पास मोहम्मद गुलाम के साथ नहीं बल्कि मोहम्मद अब्दुल हकीम के साथ आई थीं।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि बेटे को 31 जनवरी 2026 को ही मोहम्मद गुलाम के हवाले कर दिया गया था, तो फिर 4 फरवरी 2026 को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करने की जरूरत क्यों पड़ी। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने चतरा के SP को पूरे मामले की जांच कर 19 मार्च 2026 तक रिपोर्ट देने का आदेश दिया है।
साथ ही अगली सुनवाई के दिन अख्तरी खातून, मोहम्मद गुलाम और मोहम्मद अब्दुल हकीम को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
