
पटना : पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय पटना के तत्वावधान में पीएचडी कोर्स के अंतर्गत शोधार्थियों के लिए आज कालेज ऑफ कॉमर्स के जंतु विभाग में विशेष व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. जंग बहादुर पाण्डेय ने “शोध दृष्टि और सृष्टि” विषय पर संसाधन सेवी के रूप में बात की। डा. पाण्डेय ने कहा, “शोध सत्यान्वेषण है। आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। जैसे-जैसे मानव की आवश्यकता बढ़ती गई, उसने नए आविष्कार किए। मानव सभ्यता का इतिहास एक तरह से शोध का इतिहास है।”
डा. पाण्डेय ने मानव सभ्यता के पांच चरण गिनाए-पाषाण युग, पशुपालन युग, कृषि युग, औद्योगिक युग और सूचना जनक्रांति युग। उन्होंने अल्वीन ट्राफर की किताबों का भी जिक्र किया, जिनमें “तीसरी लहर” (1980) में तीन क्रांतियों-कृषि, औद्योगिक और सूचना जनक्रांति की चर्चा है, और उनकी पहली किताब “भविष्य का सदमा” (1970) भी याद दिलाई। उन्होंने कहा, “शोध केवल नए तथ्यों की खोज नहीं है, बल्कि उनकी तर्कसम्मत व्याख्या भी है। ज्ञात साधनों से अज्ञात को वैज्ञानिक तरीके से ज्ञात करना ही शोध है। शोध की यात्रा जिज्ञासा, आवश्यकता, योग्यता, तत्परता, कर्मठता, श्रद्धा और विश्वास की सरणियों से होकर गुजरती है।”

डा. पाण्डेय ने कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्रम्’ से उद्धरण भी साझा किया:
“पुराणमित्य न साधु सर्वं, न चापि काव्यं नवमित्यंवद्यम्।
संत: परीक्षान्तरेत भजंते, मूढ: पर प्रत्ययेनेय बुद्धि:”
उनका कहना था कि शोध कभी आंख मूंद कर किसी तथ्य को स्वीकार करने की अनुमति नहीं देता। कार्यक्रम में डा. मनोज गोवर्धन पुरी ने अपनी भक्ति परक रचना सुनाई, जबकि डा. मीना परिहार ने अपनी गजलों से शोधार्थियों का दिल जीत लिया। डा. पाण्डेय ने डा. संतोष कुमार, डा. वंदना कुमारी, डा. विकास कुमार और डा. रश्मि शर्मा को सुंदर कांड की प्रति देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर आगत अतिथियों का स्वागत समन्वयक डा. संतोष कुमार ने किया, संचालन डा. रश्मि शर्मा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन एक छात्रा ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम राष्ट्रगान और शांतिपाठ के साथ समापन हुआ।
