
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1974 से लंबित एक भूमि विवाद मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने राजेश्वरण भवन ट्रस्ट की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत और एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा। यह फैसला चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सुनाया।
निचली अदालत के फैसले पर लगी मुहर
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि विवादित जमीन पलामू जिले में स्थित थी, इसलिए उसका पंजीकरण वहीं होना चाहिए था। लेकिन रांची में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए केवल 200 रुपये में मेसरा (रांची) की 10 डिसमिल जमीन का दिखावटी लेन-देन किया गया, ताकि पूरी बिक्री विलेख रांची जिला अवर निबंधक कार्यालय में दर्ज हो सके।
दिखावटी लेन-देन को माना गया धोखाधड़ी
निचली अदालत और एकलपीठ ने इस प्रक्रिया को धोखाधड़ी मानते हुए बिक्री विलेख को अवैध घोषित किया था। खंडपीठ ने भी इस निष्कर्ष से सहमति जताई और कहा कि धोखाधड़ी किसी भी गंभीर कार्यवाही को निष्प्रभावी कर देती है।
नोटिस को लेकर दलील खारिज
ट्रस्ट की ओर से यह तर्क दिया गया कि बिक्री से पहले वादियों को रजिस्टर्ड नोटिस भेजा गया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने गवाहों के आधार पर पाया कि ऐसा कोई नोटिस वास्तव में तामील नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने इन तथ्यों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट से लौटकर दोबारा सुनवाई
इस मामले में पहले 2002 में हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की थी, लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने वह फैसला रद्द कर दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने पाया कि पंजीकरण प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ और 1961 के समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया गया। अंत में ट्रस्ट की एलपीए (अपील) खारिज कर दी गई।
