उलूलु ध्वनि और बंग समुदाय से उसका संबंध

उलूलु ध्वनि को अक्सर बंगाल की परंपरा माना जाता है, लेकिन इसका उल्लेख वैदिक ग्रंथों और साहित्य में भी मिलता है। बंग समुदाय ने इस प्राचीन मंगलध्वनि की परंपरा को जीवित रखा है।

Neeral Prakash
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उलूलु ध्वनि के प्रति मेरी एक स्वाभाविक उत्सुकता रही है। बंग समुदाय की महिलाएं विवाह के अवसरों पर उलूलु ध्वनि का उच्चारण करती हैं और इसे कई बार करीब से देखने का मुझे अवसर मिला है। ऐसी मान्यता है कि यह बंगदेश यानि बंगाल की रीति है, पर इसमें सत्यता नहीं है। वैदिक ग्रंथों के साथ अन्य ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। इस ध्वनि का उद्भव जहां से भी हुआ हो पर बंग समुदाय इसे साथ लेकर बढ़ता रहा है इसलिए इसे अच्छी परंपरा मानी जानी चाहिए। उलुलू ध्वनि का उल्लेख श्रीहर्ष ने अपने ग्रंथ नैषधचरित में किया है। उसने लिखा है-

कापि प्रमोदास्फुटनिर्जिहान
वर्णेव या मंगलगीतिरासाम्
सैवाननेभ्य: पुरसुंदरीणा
मुच्चैरूलूलुध्वनिरूच्चार।।

यानि जब वैदर्भी ने नल को वरमाला पहना दी तब आनंद से गद्गद कंठ स्त्रियां मंगलगीत गाने लगीं। यानि मंगलगीत गाने के समय ऊंचे स्वर में अस्पष्ट उच्चारण ही उलूलु ध्वनि है और यह बंगाल में अधिक प्रचलन में है। इस उलूलु ध्वनि पर प्रकाश नामक टीका के कर्ता नारायण ने कहा है कि विवाह आदि उत्सवों पर स्त्रियों के मंगलगीत गौड़ (बंगाल) देश में उलूलु कहलाते हैं और वे अस्पष्टवर्ण यानि अनर्थक ध्वनिमात्र होते हैं। नारायण भी इस रीति को बंगदेश की रीति समझता था पर सत्य यह नहीं है। गुजरात में जगड़ू शाह नाम का एक धनिक था। वह अणहिलपट्टन के सोलंकी राजा लवणप्रसाद (1256-1289) ई का समसामयिक था। एक जैन कवि सर्वानंदसूरि ने उसकी प्रशंसा में जगड़ू चरित बनाया है। इसमें जगड़ू की तीर्थयात्रा का वर्णन इस प्रकार है। जब तीर्थयात्रा के लिए उसका संघ चला तब आकाश शब्दमय हो गया। घोेड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड़, रथों की घरघराहट और स्त्रियों की उलुलू ध्वनि से यह शब्दसमूह उत्पन्न हुआ। संभव है कि श्रीहर्ष की कविता में उलूलु शब्द और उसका अर्थ देखकर ही सर्वानंदसूरि ने उससे इस अर्थ में प्रयुक्त किया हो। यह भी हो सकता है कि बंग को छोड़कर अन्य देशों की स्त्रियां भी इसी ध्वनि का उपयोग हर्ष प्रकट करने के लिए करती हों। अथर्ववेद में एक मंत्र है-

उद् हर्षन्ता मधवन् वाजिनानि
उद् वीराणां जयतामेतु घोष:
पृथग्घोषा उलुलय: केतुमंत उदीरताम्
देवा इंद्रज्येष्ठा मरुतो यंतु सेनया

इसका तात्पर्य है कि हे दान शील देव। हमारी सेना का पराक्रम बढ़े। उच्च स्वर के विजय शब्द न्यारे-न्यारे स्पष्ट उठें। इंद्र की प्रधानता में मरुत देव सेना के साथ चलें। यहां भी उलूलय का अर्थ ऊंचे स्वर में शब्द करनेवाला ही है। छांदोग्य उपनिषद में भी उलूलव: घोषा: का अर्थ ऊंचे स्वर वाले शब्द ही हैं। जाहिर है कि उलूलु ध्वनि का संबंध वैदिक काल से है और बंग समुदाय जो अपनी परंपराओं और लोकरीतियों के प्रति बेहद सचेत और जागरूक है उसने इस परंपरा को जीवित रखा हुआ है और उसे साथ लेकर चलता आ रहा है।

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