सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 6 हफ्ते का दिया वक्त

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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को केंद्र सरकार (Central Government) को 6 सप्ताह का समय दिया है।

यह समय उन सिफारिशों पर विचार करने के लिए दिया गया है, जो सैन्य प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हो जाने के कारण सेवा से हटाए गए अधिकारी कैडेटों के पुनर्वास से जुड़ी हैं।

28 जनवरी तक टली सुनवाई

लाइव लॉ (Live Law) की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई को 28 जनवरी तक के लिए टाल दिया।

कोर्ट ने उम्मीद जताई कि तब तक भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की सिफारिशों पर सरकार की ओर से ठोस प्रगति हो जाएगी।

तीनों सेनाओं की सिफारिशें सकारात्मक: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने जानकारी दी है कि तीनों सेनाओं की सिफारिशें सकारात्मक हैं। ऐसे में अब रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय को इन पर गंभीरता से विचार करना होगा। इसी आधार पर कोर्ट ने मामले को 28 जनवरी तक स्थगित किया है।

रक्षा मंत्रालय बनाएगा योजना

ASG ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि तीनों सैन्य मुख्यालयों से परामर्श पूरा हो चुका है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने कैडेटों के पुनर्वास को लेकर सकारात्मक सुझाव दिए हैं। उन्होंने कहा कि अब रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय से सलाह लेकर एक योजना तैयार करेगा और फिर उसे कोर्ट के सामने रखा जाएगा।

देरी पर एमिकस क्यूरी ने जताई चिंता

एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) और वरिष्ठ अधिवक्ता रेखा पल्ली ने इस मामले में हो रही देरी पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि पिछले 10 सालों से उप-समितियां इसी तरह की सिफारिशें करती आ रही हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस फैसला नहीं हुआ।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कोर्ट मंत्रालय से कह सकता है कि वह अपना फैसला सीलबंद लिफाफे में पेश करे।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उन अधिकारी कैडेटों से जुड़ा है जिन्हें सैन्य ट्रेनिंग के दौरान चोट लगने या दिव्यांग हो जाने के कारण सेवा से हटा दिया जाता है।

अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह एमिकस क्यूरी द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करे, जिनमें ऐसे कैडेटों को पहचान, पुनर्वास और सहायता देने की बात कही गई थी।

कैडेटों को कोई दर्जा नहीं मिलने पर कोर्ट की चिंता

कोर्ट ने पाया कि ऐसे कैडेटों को सेवा से हटाने के बाद कोई आधिकारिक दर्जा या पहचान नहीं दी जाती, जिससे उन्हें इलाज, आर्थिक मदद और अन्य सुविधाएं नहीं मिल पातीं।

जबकि सैनिक रंगरूटों को ऐसी स्थिति में कई तरह की सुविधाएं दी जाती हैं, कैडेटों के साथ ऐसा नहीं होता।

कम संख्या, ज्यादा बोझ नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हर साल ऐसे करीब 40 कैडेट ही सेवामुक्त होते हैं। ऐसे में सरकार पर कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे प्रभावित कैडेटों की जिंदगी काफी हद तक संभल सकती है।

पुनर्वास के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं

चिकित्सा सुविधा
आर्थिक सहायता
शिक्षा और पुनर्वास
बीमा कवर

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