विनोद दुआ : वो पत्रकार जिनकी आवाज सत्ता से सवाल पूछने से कभी नहीं डरी

शरणार्थी कॉलोनी से उठकर भारतीय टीवी पत्रकारिता की मजबूत आवाज़ बने विनोद दुआ, जिन्होंने बेखौफ सवालों, चुनाव विश्लेषण और जनवाणी जैसे कार्यक्रमों से मीडिया में नई पहचान बनाई।

Vinita Choubey
9 Min Read
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भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक दौर की आवाज़ कहा जाता है। विनोद दुआ भी उन्हीं में से एक थे। वह उन चुनिंदा पत्रकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने टीवी पत्रकारिता को सिर्फ खबर पढ़ने का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सवाल पूछने और लोकतंत्र को आईना दिखाने का मंच बना दिया। 11 मार्च 1954 को जन्मे विनोद दुआ ने भारतीय मीडिया में कई ऐसे मुकाम हासिल किए, जो उस दौर में किसी टीवी पत्रकार के लिए लगभग असंभव माने जाते थे। 1996 में वह पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकार बने जिन्हें प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। बाद में 2008 में भारत सरकार ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्म श्री से भी सम्मानित किया। लेकिन विनोद दुआ की कहानी सिर्फ पुरस्कारों की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने शरणार्थी कॉलोनियों से उठकर देश के सबसे चर्चित पत्रकारों में अपनी जगह बनाई।

शरणार्थी कॉलोनियों से शुरू हुई एक असाधारण यात्रा

विनोद दुआ का बचपन दिल्ली की उन शरणार्थी कॉलोनियों में बीता जहां 1947 के विभाजन के बाद लाखों परिवार बसाए गए थे। उनके माता-पिता सराइकी हिंदू थे जो पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान से भारत आए थे। उस दौर की मुश्किलें, सीमित संसाधन और संघर्षों से भरी जिंदगी ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया। स्कूल और कॉलेज के दिनों में ही उनकी रुचि बहस, गायन और थिएटर में दिखने लगी थी। मंच पर बोलने का आत्मविश्वास और सामाजिक मुद्दों पर संवेदनशीलता शायद वहीं से पैदा हुई थी। उन्होंने कई नाटकों में अभिनय किया और बच्चों के लिए दो नाटक भी लिखे, जिन्हें श्री राम सेंटर फॉर आर्ट एंड कल्चर के कठपुतली थिएटर ने मंचित किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से ही साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल की। लेकिन उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह युवा आगे चलकर भारतीय टीवी पत्रकारिता का चेहरा बन जाएगा।

दूरदर्शन के दौर में उभरी एक नई आवाज़

1970 के दशक में जब भारतीय टेलीविजन अभी अपने शुरुआती दौर में था, तभी विनोद दुआ ने टीवी पर कदम रखा। 1974 में उन्होंने पहली बार दूरदर्शन के युवा कार्यक्रम “युवा मंच” में दिखाई देकर लोगों का ध्यान खींचा। इसके बाद 1975 में उन्होंने सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) के लिए युवाओं का कार्यक्रम “युव जन” होस्ट किया। इसी दौरान अमृतसर टीवी पर आने वाला युवा कार्यक्रम “जवान तरंग” भी उन्होंने एंकर किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान सिर्फ एक एंकर के रूप में नहीं, बल्कि विचार रखने वाले पत्रकार के रूप में बनने लगी थी।

चुनाव विश्लेषण जिसने बदल दी पहचान

1984 का साल विनोद दुआ के करियर में बड़ा मोड़ लेकर आया। उन्होंने मशहूर चुनाव विश्लेषक प्रणॉय रॉय के साथ दूरदर्शन पर चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया। उस समय भारतीय दर्शकों के लिए चुनावी विश्लेषण का यह अंदाज़ बिल्कुल नया था। गंभीर विषय को सरल भाषा में समझाने की उनकी शैली ने लोगों को प्रभावित किया। इसके बाद वह कई चैनलों के लिए चुनाव विश्लेषण कार्यक्रमों का हिस्सा बने और धीरे-धीरे उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो गई।

“जनवाणी”: जब जनता ने सीधे मंत्रियों से पूछे सवाल

1985 में विनोद दुआ ने एक ऐसा कार्यक्रम होस्ट किया जिसने भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता की दिशा बदल दी। इस कार्यक्रम का नाम था “जनवाणी”। इस शो में आम लोगों को सीधे मंत्रियों से सवाल पूछने का मौका मिलता था। उस दौर में यह प्रयोग बेहद साहसी माना जाता था, क्योंकि पहली बार टीवी स्क्रीन पर जनता और सत्ता आमने-सामने दिखाई दे रहे थे। यह कार्यक्रम दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ और विनोद दुआ की छवि एक निर्भीक पत्रकार के रूप में मजबूत होती चली गई।

प्रोडक्शन कंपनी और नए प्रयोग

1987 में उन्होंने इंडिया टुडे ग्रुप के टीवी टुडे वेंचर से जुड़कर चीफ प्रोड्यूसर के रूप में काम किया। इसके बाद 1988 में उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी द कम्युनिकेशन ग्रुप शुरू की।
इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने करंट अफेयर्स कार्यक्रम, बजट विश्लेषण और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण किया। 1992 में उन्होंने ज़ी टीवी पर “चक्रव्यूह” नामक कार्यक्रम एंकर किया। 1992 से 1996 के बीच उन्होंने दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले साप्ताहिक कार्यक्रम “परख” का निर्माण किया।

खाने के रास्ते भारत को देखने वाला पत्रकार

बाद के वर्षों में विनोद दुआ ने NDTV इंडिया पर एक बिल्कुल अलग तरह का शो शुरू किया — “जायका इंडिया का”। यह सिर्फ खाना दिखाने वाला कार्यक्रम नहीं था। वह देश के अलग-अलग शहरों, कस्बों और हाईवे पर स्थित ढाबों तक जाते थे। वह लोगों से मिलते, उनके खाने का स्वाद चखते और उस जगह की संस्कृति को दर्शकों तक पहुंचाते। इस कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया कि पत्रकारिता सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं होती। भारत को समझने के लिए उसके स्वाद और उसकी सड़कों को भी समझना जरूरी है।

विवाद और आरोप: जब पत्रकार खुद खबर बन गया

जितनी चर्चा उनके काम की हुई, उतने ही विवाद भी उनके जीवन का हिस्सा बने। 2017 में उन्होंने अभिनेता अक्षय कुमार पर अपनी बेटी मल्लिका दुआ को लेकर एक टिप्पणी करने पर नाराज़गी जताई थी। इसके एक साल बाद फिल्म निर्देशक निष्ठा जैन ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। हालांकि, विनोद दुआ ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और इन्हें अपनी छवि खराब करने की कोशिश बताया।

जब एक पत्रकार पर लगा देशद्रोह का आरोप

2020 में एक और बड़ा विवाद सामने आया। हिमाचल प्रदेश में भाजपा प्रवक्ता नवीन कुमार ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। आरोप था कि उन्होंने अपने यूट्यूब शो “द विनोद दुआ शो” में सरकार के खिलाफ भ्रामक बातें कही हैं। उन पर देशद्रोह और अफवाह फैलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और वहां एक महत्वपूर्ण फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी नागरिक को सरकार की नीतियों की आलोचना करने का अधिकार है, जब तक वह हिंसा भड़काने की कोशिश न करे। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज सभी आरोपों को खारिज कर दिया। यह फैसला सिर्फ विनोद दुआ के लिए नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए भी महत्वपूर्ण माना गया।

एक लंबी लड़ाई के बाद आई आखिरी खबर

2021 की शुरुआत में विनोद दुआ और उनकी पत्नी दोनों कोविड-19 से संक्रमित हो गए। उनकी पत्नी का जून 2021 में निधन हो गया। इसके बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। 4 दिसंबर 2021 को नई दिल्ली में 67 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मौत के साथ भारतीय टीवी पत्रकारिता का एक ऐसा अध्याय खत्म हुआ, जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया था।

पुरस्कार और सम्मान

विनोद दुआ को अपने लंबे पत्रकारिता करियर में कई महत्वपूर्ण सम्मान मिले। 1996 में उन्हें रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म अवॉर्ड मिला। 2008 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। 2017 में मुंबई प्रेस क्लब ने उन्हें पत्रकारिता में लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए रेडइंक अवॉर्ड दिया।

एक ऐसी आवाज़ जो हमेशा सवाल पूछती रही

विनोद दुआ को याद करते समय सिर्फ उनके शो या पुरस्कार याद नहीं आते। याद आती है उनकी वह शैली जिसमें वह सीधे और बेखौफ सवाल पूछते थे। वह उन पत्रकारों में थे जो मानते थे कि लोकतंत्र में पत्रकार का काम सिर्फ खबर पढ़ना नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगना भी है। और शायद यही कारण है कि उनकी आवाज़ आज भी भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में गूंजती हुई सुनाई देती है।

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