
रांची : झारखंड में पहली बार कैमोमाइल की खेती का सफल प्रयोग शुरू हुआ है। वी.के.एस. एफपीओ के किसानों ने इस अनोखे प्रयोग को अपनाकर किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। पलामु जिले के हुसैनाबाद प्रखंड के डूमरहथा स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र में कैमोमाइल की खेती का प्रोजेक्ट शुरू किया गया है।
वी.के.एस. एग्रीफार्म प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के डायरेक्टर प्रिय रंजन सिंह की पहल पर कैमोमाइल पौधों की नर्सरी तैयार कर इसे एक एकड़ खेत में रोपा गया है। 14 मार्च को एफपीओ के सदस्यों द्वारा किसानों को कैमोमाइल की खेती की पूरी जानकारी दी गई। इस अवसर पर प्रखंड कृषि पदाधिकारी यशवंत कुमार, प्रखंड तकनीकी प्रबंधक जयगोविंद यादव और एग्री टेकनीक सेंटर के विकास जी ने कैमोमाइल के फायदों और खेती की तकनीक के बारे में विस्तार से समझाया।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक एकड़ क्षेत्र में लगभग 200 किलो ग्राम कैमोमाइल फूल का उत्पादन होता है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलो ग्राम है। साथ ही, एक एकड़ से लगभग 7 लीटर कैमोमाइल तेल प्राप्त होता है, जिसका बाजार मूल्य करीब 20 हजार रुपये प्रति लीटर है। इससे किसानों को लागत घटाने के बाद लगभग 1.5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ हो सकता है।
कैमोमाइल के सूखे फूलों से कैमोमाइल चाय बनाई जाती है, जो कैफीन-फ्री हर्बल ड्रिंक है। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में इसे बेहतर नींद, मानसिक शांति और पाचन सुधार के लिए उपयोग किया जाता रहा है। इसमें फ्लेवोनॉयड्स और एपिजेनिन जैसे बायोएक्टिव तत्व पाए जाते हैं, जो एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण प्रदान करते हैं। इसके साथ ही, कैमोमाइल तेल भी कई बीमारियों में लाभकारी माना जाता है।
कैमोमाइल की खेती पूरी तरह जैविक तरीके से की जाती है, जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता, बल्कि जैविक खाद का उपयोग किया जाता है। इस खेती से लागत कम और मुनाफा अधिक होता है। अगले वर्ष इसे पूरे झारखंड में फैलाने की योजना भी बनाई गई है। इस मौके पर वी.के.एस. एफपीओ के निदेशक प्रिय रंजन सिंह सहित सैकड़ों किसान सदस्य उपस्थित थे।
