हिन्दू नववर्ष के संदेश ठेलने से संसार में आपके नाम की डुगडुगी नहीं बजने वाली, नव-सनातनी बंधुओ!

हिन्दू नववर्ष की परंपरा, कैलेंडर विवाद और सांस्कृतिक पहचान पर उठते सवालों के बीच यह लेख बताता है कि समय, परंपरा और आधुनिक सोच के बीच संतुलन कैसे जरूरी है।

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सुशोभित

हिन्दू नववर्ष क्या होता है? बचपन में हमने यह शब्द कभी नहीं सुना था। गुड़ी पड़वा और नवसंवत् प्रतिपदा जैसे शब्द अवश्य सुने थे। मेरी माँ गुड़ी पड़वा के अवसर पर पूरणपोली पकाती थीं और इसके लिए चने की दाल एक रात पहले से भिगोई जाती थी। घर के बाहर खिड़की में बड़े कौशल और सुरुचि से गुड़ी लगाई जाती थीं- बाँस, नई साड़ी और तांबा-पीतल के लोटे-गिलास की मदद से। हालाँकि माँ महाराष्ट्रीयन नहीं थीं, किन्तु महाराष्ट्रीयन संस्कृति का उन पर बहुत प्रभाव था।

1 जनवरी को आने वाला नया साल भले इस तरह से समारोहपूर्वक न मनाया जाता हो, किन्तु यथाक्षमता घर में पन्नियों की कतरनों वाली सजावट ज़रूर की जाती थी और रात 12 बजे तक दूरदर्शन पर जसपाल भट्टी के निरापद हास्य-कार्यक्रमों को मुस्कराते हुए निहारा जाता था। फिर सब राज़ी-ख़ुशी एक-दूसरे को हैप्पी न्यू ईयर बोलकर सो जाते थे। तब कोई नया साल हिन्दू या ईसाई नहीं था, बस एक अभावग्रस्त जीवन में प्रसन्न होने के दो भिन्न-भिन्न उपाय थे- पहली जनवरी से लेकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तक। उस ख़ुशी में सरलता थी, भोलापन था, उसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अहंमन्यता का विष घुला हुआ नहीं था।

तो हिन्दू नववर्ष क्या होता है? यह वर्ष चैत्र से आरम्भ होता है या अग्रहायण से? वैदिक काल में तो अग्रहायण ही वर्ष का प्रथम मास था। अग्रहायण शब्द का अर्थ ही प्रथम मास होता है। श्रीकृष्ण ने इसीलिए गीता में स्वयं को मासों में मार्गशीर्ष (अग्रहायण) कहा है। यह हेमंत ऋतु का पहला मास है। तो वर्ष वसन्त में आरम्भ होते हैं या हेमन्त में? बंगालियों का नया साल तो वैशाख में शुरू होता है- पोइला बैसाख। तो पहले यह तय कर लें कि वर्ष का प्रथम मास कौन-सा है।

फिर यह तय करें कि हिन्दू पंचांग कौन-सा है? विक्रम या शक या कोई और? उत्तर-भारतीय विक्रम सम्वत् को ही हिन्दू पंचांग मानने लगे हैं। विक्रम विक्रमादित्य ने चलाया, शक कनिष्क ने। दोनों में से कौन-सा अधिक प्रतापी हिन्दू था? भारत का राष्ट्रीय पंचांग तो शक संवत् ही माना गया है। इसे विक्रम की तुलना में अधिक वैज्ञानिक और मानक माना जाता है। किन्तु हिन्दू नववर्ष वाले वर्तमान वर्ष को विक्रम सम्वत् के अनुसार 2083 बतलाते हैं, शक सम्वत् के अनुसार 1948 नहीं। क्या उन्हें भारतीय राष्ट्रीय पंचांग से कुछ समस्या है?

फिर अगर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू नववर्ष का आरम्भ है तो क्या 1 जनवरी ईसाई नववर्ष का आरम्भ है? ग्रेगोरियन कैलेंडर को तो 1582 में पोप ग्रेगरी ने ही शुरू किया था। तो क्या आप-मैं-हम-सभी ईसाई कैलेंडर का पालन करने वाले विधर्मी हैं? वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व में जो प्रचलित मानक पंचांग है, वो यह ग्रेगोरियन कैलेंडर ही है, जो जनवरी से शुरू और दिसम्बर पर समाप्त होता है। कट्टर से कट्टर हिन्दू से भी अगर पूछें कि आज की तारीख़ क्या है, तो वो 19 मार्च 2026 ही कहेगा। उसके दिमाग़ में समय की जो घड़ी है, वह ईसाई कैलेंडर के हिसाब से ही टिक-टिक कर रही है, किन्तु वह हिन्दू नववर्ष का उत्सव बहुत ज़ोर-शोर से मनाता है? क्या इसमें कुछ विडम्बना है?

जिस कैलेंडर का हिन्दू ख़ुद पालन नहीं करता, उसका उत्सव मनाकर क्या वह उसका उपहास कर रहा होता है? यही अवस्था संस्कृत भाषा की भी है। बहुसंख्य हिन्दू स्वयं संस्कृत बोलता या समझता नहीं, न ही अपने बच्चों को संस्कृत में शिक्षा देता है (राष्ट्रवादियों के बच्चे तो अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं), किन्तु संस्कृत का गुणगान वह बहुत करता है। इधर मैंने वैदिक घड़ी जैसे प्रयोग भी देखे। एक प्रदेश के नेता ने तो अपने सरकारी आवास के बाहर वैदिक घड़ी लगवा रखी है। जबकि समूचे संसार की कालगणना ग्रीनविच मीन टाइम पर टिकी है। सात समन्दर लाँघकर दूसरे देश जाने पर कट्टर हिन्दू भी अपनी घड़ी ग्रीनविच मीन टाइम के हिसाब से मिला लेता हैं, किन्तु दिल में वैदिक घड़ी बसी हुई है, जो कहीं चलती नहीं। क्या अद्भुत हीनता ग्रंथि है, मित्र!
हिन्दू शब्द तो वेदों-पुराणों में है भी नहीं। सनातन शब्द अवश्य है किन्तु शाश्वतता के अर्थ को रूपायित करने के लिए। यह वही शाश्वतता है, जिसे ऋत और नित्य कहा गया है। अनित्य का उपदेशक होने के बावजूद बौद्ध धर्म में भी यही सनातन शब्द भिन्न रूप में मिलता है- एस धम्मो सनन्तनो। अर्थात्, यही अटल सत्य है। तो हिन्दू शब्द हिन्दू परम्परा में कहीं नहीं है और सनातन शब्द पर भी हिन्दुओं का एकाधिकार नहीं है। फिर किस बात का हिन्दू नववर्ष, मित्रो!

इन हीनभावनाओं से बाहर निकलकर युद्ध, विषाद, मनश्ताप और अवसाद से जूझ रहे संसार के लिए कुछ मूल्यवान, मानवीय, सुंदर, सार्थक रचो तो उसे आपका एक मौलिक साभ्यतिक योगदान समझा जावेगा। यहूदियों के द्वारा निर्मित और अमरीकी एल्गोरिद्म से संचालित वॉट्सएप्प पर हिन्दू नववर्ष के संदेश ठेलने से संसार में आपके नाम की डुगडुगी नहीं बजने वाली, नव-सनातनी बंधुओ!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।