
मनुष्य इस संसार का सर्वाधिक विवेकशील प्राणी है। गीता के अनुसार ज्ञान इस संसार में पवित्रतम है। ज्ञान की अनेक शाखाएं हैं, उनमें साहित्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण शाखा है। साहित्य दो शब्दों के योग से बना है-स+हित। स का अर्थ साथ और हित का अर्थ कल्याण एवं परोपकार है। अतः संस्कृत की उक्ति है हितेन स:इति साहित्यम्। अर्थात् ज्ञान की वह शाखा जो सबका मंगल विधान करे साहित्य है। इसीलिए साहित्य का आशीर्वादात्मक स्वर है:
सर्वे भवंतु सुखिन:,
सर्वे संतु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु,
मा कश्चिद् दुख भाग्भवेत्।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि-ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।साहित्य को परिभाषित करते हुए आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा है कि-किसी जाति के पूर्वजों का चिर संचित ज्ञान वैभव ही साहित्य है।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कल्पलता में लिखा है कि -सारे मानव समाज को सुंदर बनाने की साधना का नाम साहित्य है।
तुलनात्मक साहित्य (Comparative Literature ) ज्ञान की वह शाखा है, जिसमें दो या अधिक भिन्न भाषायी, राष्ट्रीय या सांस्कृतिक समूहों के साहित्य का अध्ययन किया जाता है। तुलना इस अध्ययन का प्रमुख अंग है। साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन व्यापक दृष्टि प्रदान करता है;
संकीर्णता के विरोध में व्यापकता आज के विश्व-मनुष्य की आवश्यकता है। सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान् हेनरी एच. एच. रेमाक ने तुलनात्मक साहित्य की परिभाषा इस प्रकार दी है:- ” तुलनात्मक साहित्य एक राष्ट्र के साहित्य की परिधि के परे दूसरे राष्ट्रों के साहित्य के साथ तुलनात्मक अध्ययन है;यह अध्ययन कला, इतिहास, समाज विज्ञान, धर्मशास्त्र आदि ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के आपसी संबंधों का भी अध्ययन है। ”
तुलनात्मक साहित्य एक परिचय:-तुलनात्मक साहित्य अंग्रेजी के कम्पैरेटिव लिटरेचर का हिन्दी अनुवाद है। यह एक स्वतन्त्र विद्या शाखा के रूप में विकसित है तथा विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इसके अध्ययन -अध्यापन के कार्य को आजकल विशेष महत्व दिया जा रहा है। अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध कवि मैथ्यू आर्नल्ड ने सन् 1848 में अपने एक पत्र में सबसे पहले कम्पैरेटिव लिटरेचर पद का प्रयोग किया था।
भारत में सन् 1907 में विश्व कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने विश्व साहित्य का उल्लेख करते हुए साहित्य के अध्ययन में तुलनात्मक दृष्टि की आवश्यकता पर जोर दिया था।
मानव के सांस्कृतिक इतिहास की सहज धारा के आश्रय में ही रवि बाबू ने तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन पर बल दिया था।
तुलनात्मक साहित्य के विषय में एक स्वतंत्र अध्ययन को मान्यता देना आज भी विवादग्रस्त विषय है। तुलनात्मक साहित्य का भी एक दृष्टिकोण है, एक प्रविधि है और एक तकनीकी है। तुलनात्मक साहित्य की प्रवृत्तियां अभी भी पूरी तरह से स्थिर नहीं हो पायी हैं।
इसके अध्ययन का आरम्भ हम इतिहास बोध से करते हैं, किन्तु उसकी परिसमाप्ति एक प्रकार के सार्वभौम साहित्येतिहास में होती है।
तुलनात्मक साहित्य, एकल साहित्य (single linerature) अध्ययन से भिन्न है। एकल साहित्य का अध्ययन जहाँ साहित्य के सीमित अध्ययन की दिशा की ओर संकेत करता है, वहीं तुलनात्मक साहित्य हमें साहित्य के व्यापक अध्ययन की दिशा में से जाता है।
यहाँ तुलना इस बात की नहीं होती कि कौन-सा साहित्यकार श्रेष्ठ है, बल्कि तुलना इस बात की होती है कि दोनों साहित्यकारों में समानता और भिन्नता के बिन्दु कौन-से हैं।
कहाँ भाव- संवेदनाएं-विचार-कला एक दूसरे के साथ मिलते हैं कहाँ अलग हैं। यह दूसरे को पहचानने तथा स्वीकार करने की दिशा में पाठक को ले जाता है। वर्तमान समय में इसकी विशेष आवश्यकता है।
तुलनात्मक साहित्य और भारत:-भारत एक बहुभाषा -भाषी देश है।भारतवर्ष अनेक भाषाओं का विशाल देश है। उत्तर पश्चिम में पंजाबी, हिंदी और उर्दू, पूर्व में उडिया, बंगला और असमिया, मध्य पश्चिम में मराठी और गुजराती और दक्षिण में तमिल, तेलगु, कन्नड और मलयालम।
इनके अतिरिक्त कतिपय और भी भाषाएँ हैं, जिनका साहित्यिक और भाषा वैज्ञानिक महत्व कम नहीं है-कश्मीरी, डोगरी, सिंधी, कोंकणी तुरू आदि।
यहाँ न केवल 1652 मातृ-भाषाएँ हैं, अपितु अनेक समुन्मत साहित्यिक भाषाएं भी हैं। जिस प्रकार अनेक वर्षों के आपसी सम्पर्क और सामाजिक दुविभाषिकता के कारण भारतीय भाषाएं अपनी रूप रचना से भिन्न होते हुए भी अपनी आर्थिक संरचना में समरूप हैं, इसी प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि अपने जातीय इतिहास, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक मूल्य एवं साहित्यिक संवेदना के संदर्भ में भारतीय साहित्य एक है। डा नगेंद्र ने भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता शीर्षक निबंध में लिखा है कि ” भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए सांस्कृतिक एकता का आधार अनिवार्य है और सांस्कृतिक एकता का सबसे दृढ एवं स्थायी आधार है साहित्य।
जिस प्रकार अनेक निराशावादियों की आशंकाओं को विफल करता हुआ भारतीय राष्ट्र निरंतर अपनी अखंडता में उभरता आ रहा है, उसी प्रकार एक समंजित इकाई के रूप में भारतीय साहित्य का विकास भी धीरे धीरे हो रहा है। यदि मूलवर्ती चेतना एक है तो माध्यम का भेद होते हुए भी साहित्य का व्यक्त रूप भी भिन्न नहीं हो सकता। ” भारतीय साहित्य और संस्कृति की संकल्पना के मूल्य में भारतीय संस्कृति की आधार भूत एकता और वैशिष्ट्य की पहचान की छटपटाहट है।
किन्तु इस पहचान’ के लिए जो प्रयास होना चाहिए था उसके लिए साहित्यिक अध्ययन का जो तुलनात्मक आधार मिलना चाहिए था और तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन के जो संदर्भ, प्रणाली और तकनीक का विकास होना चाहिए था, वह दिखलाई नहीं पड़ता।
भारत में बहुत कम विश्वविद्यालय हैं, जहां तुलनात्मक साहित्य’ की संकल्पना एक विधा के रूप में हो और जहाँ तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन -अध्यापन पाठ्य क्रम में प्रस्तावित हो।
तुलनात्मक साहित्य (Comparative Literature) दो या अधिक भाषाओं, संस्कृतियों या विषयों के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन है, जो सांस्कृतिक एकता को समझने, अनुवाद के माध्यम से वैचारिक आदान-प्रदान बढ़ाने और साहित्य के वैश्विक परिप्रेक्ष्य को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यह राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाकर साहित्यिक कृतियों की समानता,भिन्नता और प्रभाव को विश्लेषित करता है।
तुलनात्मक साहित्य की प्रयोजनीयता एवं महत्व
ज्ञान की सभी शाखाओं की अपनी अपनी प्रयोजनीयता है। मानव जीवन के विकास में तुलनात्मक साहित्य का विशेष महत्व है।
सांस्कृतिक समझ और एकता
यह विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के साहित्य के बीच संबंध स्थापित कर ‘अनेकता में एकता’ को उजागर करता है, जिससे सांस्कृतिक समझ विकसित होती है।
अनुवाद और आदान-प्रदान
यह अनुवादक की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाकर विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है, जिससे एक-दूसरे के साहित्यिक परिदृश्य को समझने में सहायता मिलती है।
वैश्विक दृष्टिकोण
रवींद्रनाथ ठाकुर के अनुसार यह “विश्व साहित्य” की अवधारणा को साकार करता है, जो साहित्य को संकुचित राष्ट्रीयता से मुक्त कर मानवतावादी दृष्टिकोण प्रदान करता है। वेद व्यास ने महाभारत में यह घोषणा की है कि
अष्टादश पुराणेषु, व्यासस्य वचनं द्वयं।
परोपकाराय पुण्याय, पापाय पर पीडनम्।
इसी मानवतावादी भावना को व्यक्त करते हुए महाकवि तुलसी ने मानस में लिखा कि :-
परहित सरिस धर्म नहि भाई।
परपीडा सम नहि अघमाई।
परहित बस जिनके मन माहीं।
जग दुर्लभ तिनके कछु नाहीं।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
विभिन्न साहित्य परंपराओं के अध्ययन से किसी एक साहित्य की खूबियों और कमियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और नए सृजनात्मक दृष्टिकोण विकसित हो सकते हैं।
साहित्यिक आंदोलन का अध्ययन
यह विभिन्न भाषाओं में चल रहे साहित्यिक आंदोलनों, प्रवृत्तियों और ऐतिहासिक संदर्भों की तुलना कर साहित्य के विकास को समझने में सहायक है।
तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन का महत्व
यह साहित्य की सीमाओं को पार कर अंतर-विषयक (interdisciplinary) दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
यह वैश्वीकरण के दौर में स्थानीय और वैश्विक के बीच सेतु का कार्य करता है।
यह मानवीय संवेदनाओं और अनुभवों के सांझेपन को समझने की दृष्टि प्रदान करता है।
यह मानवीय संवेदनाओं और अनुभवों के सांझेपन को उजागर कर विश्व बंधुत्व की भावना को पुष्ट करता है। पंचतंत्र में आचार्य विष्णु शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि:-
अयं निज:परो वेति गणना लघु चेतसाम्।
उदार चरितानामतु, वसुधैव कुटुंबकम्।
निष्कर्ष :-तुलनात्मक साहित्य ज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है।तुलनात्मक साहित्य का महत्व साहित्यिक अध्ययन को संकुचित दायरे से बाहर निकालकर उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने और विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करने में है।
संदर्भ ग्रंथ-
1हिंदी साहित्य का इतिहास -संपादक -डा नगेंद्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली -2001
2 तुलनात्मक साहित्य :भारतीय परिप्रेक्ष्य डा इंद्रनाथ चौधुरी-वाणी प्रकाशन नई दिल्ली 2006
3 भारतीय साहित्य का समेकित इतिहास -संपादक डा नगेंद्र, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली 1972
4 भारतीय साहित्य -डा संजीव कुमार जैन, लक्ष्मी पब्लिशिंग हाउस, रोहतक-1990
5 भारतीय साहित्य:एक शोधात्मक-डा रामायण प्रसाद टंडन-काव्य पब्लिकेशन, भोपाल-462002-2020

