
हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों में शामिल सुमित्रानंदन पंत की आज जयंती मनाई जा रही है। प्रकृति और सौंदर्य के अद्भुत कवि पंत का जन्म 20 मई 1900 को कौसानी में हुआ था। उनका वास्तविक नाम गोसाई दत्त पंत था। वे गंगादत्त पंत की आठवीं संतान थे। बचपन से ही प्रकृति के प्रति उनका गहरा लगाव था, जिसका प्रभाव उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। झरनों, पर्वतों, फूलों, शीतल पवन, उषा और संध्या जैसे प्राकृतिक बिंब उनके काव्य की पहचान बने।
बचपन से ही साहित्य के प्रति था झुकाव
सुमित्रानंदन पंत का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। जन्म के मात्र छह घंटे बाद उनकी माता का निधन हो गया था। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी ने किया। सात वर्ष की उम्र में ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद वे वर्ष 1917 में अपने भाई के साथ काशी पहुंचे और क्वींस कॉलेज में अध्ययन किया। यहीं से उनके साहित्यिक जीवन को नई दिशा मिली।
गोसाई दत्त से बने सुमित्रानंदन पंत
पंत का असली नाम गोसाई दत्त पंत था, लेकिन बाद में उन्होंने इसे बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया। कहा जाता है कि उन्हें अपने पुराने नाम में गोस्वामी तुलसीदास के संघर्षपूर्ण जीवन की छवि दिखाई देती थी। वे अपने जीवन को उस प्रकार की कठिन परिस्थितियों से दूर रखना चाहते थे। इस विषय का उल्लेख उन्होंने एक आकाशवाणी साक्षात्कार में भी किया था।
‘पल्लव’ से मिली नई पहचान
सुमित्रानंदन पंत की साहित्यिक यात्रा तेजी से आगे बढ़ी। वर्ष 1926-27 में उनका पहला काव्य संग्रह ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें हिंदी साहित्य में नई पहचान दिलाई। उनकी कविताओं में प्रकृति, सौंदर्य और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। वे कुछ समय तक कार्ल मार्क्स और फ्रायड की विचारधारा से भी प्रभावित रहे। उन्होंने ‘रूपाभ’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया। उनके जीवनकाल में कविता, नाटक और निबंध सहित कुल 28 पुस्तकें प्रकाशित हुईं।
कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से हुए सम्मानित
हिंदी साहित्य में योगदान के लिए सुमित्रानंदन पंत को कई बड़े सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें वर्ष 1961 में पद्मभूषण, 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी रचनाएं आज भी हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

