
सुशोभित
नेता जनता का प्रतिनिधि होता है। उसे जनता का काम करने के लिए और जनता को जवाब देने के लिए ही कुर्सी पर बिठाया जाता है। चूँकि काम बड़ा है, इसलिए उसे इसके लिए कुछ सुविधाएँ दी जाती हैं- फैक्स, टेलीफोन, कार्यालय, आवास, वाहन। लेकिन धीरे-धीरे ये सुविधाएँ इतनी बढ़ती चली जाती हैं कि कालान्तर में लोग भूल ही जाते हैं कि यह नेता उनका नुमाइंदा है, वह कोई शासक नहीं है। वह राजा नहीं है, हाकिम नहीं है। उसकी ड्यूटी ही लोगों के लिए काम करने की है। यह करने पर उसे कोई श्रेय नहीं मिलना चाहिए। ना करे तो उसे कठघरे में अवश्य खड़ा किया जा सकता है।
जैसे नेता जनता का प्रतिनधि होता है, उसी तरह से पत्रकार भी जनता का प्रतिनिधि है। लेकिन थोड़ा भिन्न तरीक़े से। नेता का जिम्मा है, जनता के लिए काम करना। पत्रकार का जिम्मा है, नेता से सवाल पूछना और उसके कामों का हिसाब माँगकर जनता के सामने प्रस्तुत करना। ऐसे में पत्रकार, जनता और नेता के बीच एक सेतु का काम करता है। जब पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं करता, तो यह सेतु टूट जाता है।
शायद, अमृतकाल में हम भूल ही गए हैं कि प्रजातंत्र क्या होता है, जनप्रतिनिधित्व क्या होता है, स्वतंत्र-पत्रकारिता क्या होती है, जवाबदेही किस चिड़िया का नाम है। देश सवालों से भरा है, लेकिन सवाल सत्ता तक पहुँच नहीं पाते। जिन्हें जनता को जवाब देना चाहिए, वो सवालों का सामना नहीं करते। पत्रकार-वार्ता से कतराकर निकल जाते हैं। जिन्हें सवाल पूछने चाहिए, वो सवाल नहीं पूछते। ऐसे में लोकतंत्र ध्वस्त हो जाता है, व्यवस्था चरमरा जाती है, नैतिक-पतन और उन्मुक्त-भ्रष्टाचार की ग़र्त में देश डूब जाता है। नॉर्वे की पत्रकारिता को सलाम- उन्होंने गले में घुटी, रूंधी, गूँगी आवाज़ों वाले भारत को बताया कि स्वयं को सत्ताधीश समझ बैठे जनप्रतिनिधि को ललकारकर जवाब-तलब करना क्या होता है!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

