लव-कुश एकता बनी बदलाव की बुनियाद : विवेकानंद कुशवाहा

लव-कुश एकता ने बिहार की राजनीति में बदलाव की नींव रखी, समता पार्टी से लेकर नीतीश कुमार के नेतृत्व तक सामाजिक समीकरणों ने सत्ता की दिशा तय की।

Archana Ekka
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Vivekanand Kushwaha : समता पार्टी (जदयू) की बुनियाद में लव-कुश समाज का खून-पसीना दोनों मिला है। मुझे याद है कि खगड़िया की इस तस्वीर की तरह हमारे तरफ भी इसी तरह का सम्मेलन आयोजित हुआ था, जिसमें कोइरी, कुर्मी और धानुक तीनों समाज के प्रबुद्ध/जागरूक लोग गांव-गांव जाकर लोगों को सम्मेलन में शामिल होने के लिए एकजुट कर रहे थे। मेरे घर भी लोग आये।

भोजन-पानी हुआ, लेकिन मेरे पिताजी ने कहा मुझे छोड़ दीजिए। मैं कम्युनिस्ट पार्टी में हूं और मरते दम तक कम्युनिस्ट रहना ही पसंद करूंगा

मेरे पिताजी सीपीआई से जुड़े थे और जिले के सक्रिय कैडर थे। उस समय हमारे धोरैया विधानसभा के विधायक भी सीपीआई से होते थे नरेश दास।

कॉमरेड वासुदेव यादव के साथ ने उनको विधायक बनवा दिया था। अन्यथा वे न सड़कें बनवा पाते थे, न ही कोई और काम करवा पाते थे। सुनना पड़ता था नीचे कैडर लोगों को। यही कारण रहा कि मेरे पिताजी को छोड़ कर मेरे परिवार के चाचा लोग सहित गांव के अधिकांश लोग समता पार्टी से जुड़ गये।

उस समय लालू जी मुख्यमंत्री थे, वंचित तबके के लिए हीरो जैसी छवि थी उनकी। आसमान में हेलीकॉप्टर दिखने पर सबको यही लगता था कि उसमें लालू यादव ही होंगे, भले कोई और भी क्यों न हो।

हालांकि, लव-कुश के साथ-साथ संपूर्ण वंचित तबके में यह करिश्मा ज्यादा देर तक नहीं रहा, क्योंकि लोगों की आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं था। क्षेत्र में विकास के काम नगण्य थे। ज्यादातर विधायक फंडलेस होते। कोई टेंडर पास होता भी तो काम पूरा होते-होते पैसों का बंदरबांट हो जाता।

ठीकेदार का मतलब चोर होता था। दिल से मेरे पिताजी भी सरकार के खिलाफ हो गये थे, लेकिन वोट हमेशा हसुआ-बाली को ही डाला। बस पार्टी में अपनी सक्रियता लगभग खत्म कर दी।

इस बीच समता पार्टी की मशाल वंचितों के बीच जलने लगी थी। नतीजा यह हुआ कि भूदेव चौधरी मंच पर शायरी पढ़ते, मंच संचालन करते-करते हमारे क्षेत्र के विधायक बन गये।

नरेश दास बाद में एक बार राजद की टिकट पर लड़ने आ गये, तो मेरे पिताजी ने नरेश दास और जयप्रकाश यादव के सामने ही कह दिया कि नरेश को छोड़ कर दूसरे किसी आम वर्कर को टिकट दिये होते तो चांस भी था, नरेश नहीं जीत पायेगा। जयप्रकाश जी को उस समय यह बात बुरी भी लगी, लेकिन हुआ वही। नरेश नहीं जीत पाये।

खैर, समता पार्टी जब 1995 में सात सीटों पर सिमट गयी थी, तो लोगों को लगा कि समता की मशाल बुझ गयी, लेकिन वह नीतीश कुमार के नेतृत्व का बीजारोपण था।

सात विधायकों में नीतीश कुमार, शकुनी चौधरी, श्रवण कुमार जैसे लोग शामिल थे। बाद में कारवां बढ़ता गया और नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने।

नीतीश जी की खास बात यह रही कि बिहार के बदलाव में उन्होंने बहुतों की मदद जरूर ली, लेकिन करना क्या है, यह सलाह लेने की जरूरत उनको कभी नहीं रही होगी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।