असम चुनाव के बहाने सामने आ रहा चाय बगान में काम करनेवाले मजदूरों का दर्द

असम के चाय बगानों में मजदूरों का शोषण जारी, आदिवासी समुदाय हक से वंचित, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चुनावी प्रचार के दौरान उनकी समस्याओं को उजागर किया।

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दयानंद राय

रांची : असम में विधानसभा चुनाव के बहाने राजनीतिक दलों की रस्साकशी से चाय बगानों में काम करनेवाले मजदूरों का दर्द उजागर हो रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान जो खबरें छप रहीं हैं उनसे साफ हो रहा है कि लंबे अरसे से चाय बगानों के मालिक उनका शोषण करते आ रहे हैं। असम में वर्तमान में भाजपा की सरकार है पर वो भी इन चाय बगानों के मजदूरों के लिए कुछ खास करती नहीं दिखती।

आदिवासी समुदाय के साथ होता है भेदभाव

असम में चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चाय बगानों में काम करनेवाले आदिवासी भाई-बहनों का दर्द देखा। उन्होंने 31 मार्च को किए गए सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि असम में शोषित और वंचित समाज, ख़ासकर आदिवासी समाज के साथ सदियों से भेदभाव होता रहा है। उनकी बिजली काट दी जाती है। चाय बागान में उन्हें नाम मात्र की ही मजदूरी मिलती है। उन्हें आवास भी नहीं दिया जाता है। ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? मगर अब और नहीं, तीर-धनुष दिलाएगा मेरे इन भाइयों-बहनों को उनका हक-अधिकार। एक और पोस्ट में हेमंत ने लिखा कि अगर झारखंड 3 कमरे का आवास अपने गरीब लोगों को दे सकता है, 50 लाख महिलाओं को 2500 रु. प्रति महीना का सम्मान राशि दे सकता है तो असम में क्यों नहीं दिया जा सकता है? असम में अभी सरकारों ने बारी-बारी से असम के आदिवासियों को ठगने का काम किया है, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखने का काम किया है। लेकिन अब और नहीं। तो यह साफ है कि असम में चाय बगानों में काम कर रहे मजदूरों का शोषण होता है।

शोषण करते हैं चाय बगानों के मालिक

असम के चाय बगानों में मजदूरों की कहानी नई नहीं है, बरसों से ऐसी ही है। रिकॉर्ड बताते हैं, इतने ही काम के 2012 में 84 रुपए रोजाना दिए जा रहे थे। 2013 में पारिश्रमिक बढ़ा, लेकिन महज 5 रुपए। मजदूरों का रोजाना पारिश्रमिक 89 रुपए हो गया। 2014 में फिर से पारिश्रमिक बढ़ाने का छलावा किया गया। इस बार भी राशि की बढ़ोतरी के लिए पहले से चली आ रही प्रक्रिया अपनाई गई। असम के 74 बागान गोलाघाट जिले में हैं। असम की 2.33 लाख हेक्टेयर जमीन पर चाय की खेती होती है। असम विश्व चाय बाजार की करीब 22% जरूरतों को पूरा करता है। यहां के बागानों में करीब 8 लाख मजदूर काम करते हैं। इनमें भी 57% यानी 4.56 लाख महिलाएं हैं। बगानों की मालिकों के पांच संगठन नॉर्थ ईस्ट टी एसोसिएशन, टी-एसोसिएशन ऑफ इंडिया, असम टी प्लांटेशन एसोसिएशन, भारतीय चा परिषद और इंडिया टी-एसोसिएशन के साथ सीसीपीए ने मिलकर फिर से मजूदरों के दैनिक वेतन में 5 रु. बढ़ाकर रोजाना 94 रु. कर दिए।

2015 में 11 रुपए रोजाना मजदूरी बढ़ा दी गई। इस बार मजदूरों का रोजाना वेतन 115 रुपए हो गया। 2016 में फिर 11 रुपए बढ़े और दैनिक वेतन 126 रुपए पहुंच गया। इस 2017 में भी 11 रुपए बढ़ाए और अब मजदूरों को रोजाना 137 रुपए मिल रहे हैं। चाय बागानों में काम कर मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए 60 साल पुराना असम चाह मजदूर संघ (एसीएमएस) भी काम नहीं कर पा रहा। 1958 में अस्तित्व में आए संघ ने 2009 तक 3.25 लाख मजदूरों को सदस्य बनाया। इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस से एफिलिएटेड यह संघ राज्य व केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी मजदूरों को हक नहीं दिला सका। 49 साल पहले बने भारतीय चाह मजदूर संघ (बीएसएमएस) ने भी पूरे असम में 2 लाख मजदूरों को अपना सदस्य बनाया, लेकिन उन्हें सम्मानजनक मानदेय नहीं दिला सके।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।