
दयानंद राय
आज पूरा देश बाबा साहेब भीमराव अंबेदकर की जयंती मना रहा है। ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि उनकी पहली प्रतिमा कहां स्थापित की गयी थी। तो उसका जवाब ये है कि बाबा साहेब अंबेडकर की पहली प्रतिमा उनके निधन के चार महीने के बाद, 14 अप्रैल 1957 को राजधानी के रानी झांसी रोड पर स्थित अंबेडकर भवन में स्थापित की गई थी। यह प्रतिमा आकार में भले ही छोटी थी, लेकिन अपने भीतर गहरी भावनाएं समेटे हुए थी। महत्वपूर्ण है कि बाबा साहेब ने खुद अंबेडकर भवन की 16 अप्रैल 1950 को नींव रखी थी। दरअसल, बाबा साहेब के करोल बाग में बहुत सारे चाहने वाले थे। वे करोल बाग के टैंक रोड और रैगरपुरा जैसे इलाकों में अपने परिचितों से मिलने-जुलने के लिए जाना पसंद करते थे। यहां दलितों की घनी बस्तियां हैं। इसलिए उन्होंने अपने जीवनकाल में करोल बाग के पास जमीन ले ली थी जहां उनकी अध्ययन केंद्र बनाने की योजना थी।
संसद भवन में बाबासाहेब
डॉ. अंबेडकर की संसद भवन परिसर में प्रतिमा 2 अप्रैल 1967 को स्थापित हुई थी। उसका अनावरण किया था भारत के तब के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने। इस प्रतिमा को तैयार किया था महान मूर्तिशिल्पी श्री बी.वी. वाघ ने। संसद भवन के गेट नंबर तीन पर लगी बाबा साहेब की शानदार प्रतिमा में वाघ ने उन्हें जनता का आह्वान करते हुए दिखाया है। उनके एक हाथ में भारत के संविधान की प्रति भी है। वाघ ने ही तिलक ब्रिज पर बाल गंगाधर तिलक और मिन्टो रोड में छत्रपति शिवाजी की प्रतिमाएं भी बनाई थीं। वाघ मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे। उनकी कृतियां मुंह से बोलती हैं। वास्तव में वे कमाल के मूर्तिशिल्पी थे। इस बीच, बाबा साहेब का संसद भवन के सेंट्रल हॉल में लगा चित्र सुश्री जेबा ने बनाया था। इसका अनावरण देश के प्रधानमंत्री के रूप में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 12 अप्रैल 1990 को किया था।
जनपथ पर अंबेडकर फाउंडेशन
बाबा साहेब का कभी 15 जनपथ से सीधा संबंध नहीं रहा। तो फिर उनके नाम पर फाउंडेशन जनपथ में क्यों बनाया गया? दरअसल इसकी वजह यह थी कि 15 जनपथ पर बाबा साहेब के परम सहयोगी भाऊराव कृष्णजी गायकवाड़ दो बार रिपब्लिकन पार्टी के संसद सदस्य के रूप में रहे। उन्होंने भी बाबा साहेब के साथ 14 अक्तूबर 1956 को बुद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। फिर 15 जनपथ का बंगला रिपब्लिकन पार्टी का दफ्तर भी रहा। इसलिए सरकार ने इसे अंबेडकर फाउंडेशन के रूप में विकसित किया। अब इधर बाबा साहेब की एक भव्य प्रतिमा भी लगी हुई है, जिसे मूर्तिशिल्पी राम सुतार ने बनाया था।
महापरिनिर्वाण भूमि : 12 फीट ऊंची कांस्य मूर्ति
बाबा साहेब ने राजधानी में अपने जीवन के पांच साल बिताए और 6 दिसंबर 1956 को महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उनकी मूर्तियां राजधानी के विभिन्न हिस्सों में स्थापित हैं, जो उनकी जीवन गाथा और योगदान की याद दिलाती हैं। राजधानी की एक और महत्वपूर्ण जगह डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक है, जिसे महापरिनिर्वाण भूमि के नाम से जाना जाता है। यह सिविल लाइंस मेट्रो स्टेशन के पास 26 अलीपुर रोड पर स्थित है। यहीं बाबा साहेब ने 1951 से 1956 तक अपना निवास किया और अंतिम सांस ली। इस स्मारक में 12 फीट ऊंची कांस्य मूर्ति प्रमुख आकर्षण है। इस स्मारक का डिजाइन आधुनिक और बौद्ध वास्तुकला का मिश्रण है। यहां अशोक स्तंभ की प्रतिकृति, संगीतमय फव्वारे, ध्यान कक्ष में बुद्ध की मूर्ति और बाबा साहेब के जीवन पर आधारित संग्रहालय है।
सुप्रीम कोर्ट से विधानसभा तक
सुप्रीम कोर्ट में भी बाबा साहेब की एक प्रतिमा स्थापित है, जो न्यायपालिका में उनके योगदान को दर्शाती है। वे संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे, इसलिए यह मूर्ति कानूनी प्रणाली के स्तंभ के रूप में उनकी उपस्थिति को मजबूत करती है। इसके अलावा, बाबा साहेब की मूर्तियां दिल्ली विधान सभा और कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित महाराष्ट्र सदन में भी मौजूद हैं। ये मूर्तियां भी कमाल की हैं। इन्हें आप कुछ पल रुककर अवश्य देखें।
सामाजिक जागृति का माध्यम
बाबा साहेब की ये सब मूर्तियां केवल सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक जागृति का माध्यम हैं। इनके सामने श्रद्धालु बाबा साहेब की जयंती पर 14 अप्रैल को तथा 6 दिसंबर को महापरिनिर्वाण दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इनके अलावा भी दिल्ली के कई चौराहों, पार्कों और सरकारी भवनों में बाबा साहेब की छोटी-बड़ी मूर्तियां देखी जा सकती हैं।

