
रांची: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया के एक्स हैंडल पर ताबड़तोड़ दो पोस्ट कर सीआईडी जांच की कार्यप्रणाली और इसके एडीजी मनोज कौशिक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार पर करारा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि झारखंड में जेपीएससी (JPSC) और सीजीएल (CGL) परीक्षा घोटालों की जांच कर रही सीआईडी (CID) की सत्यनिष्ठा और कार्यप्रणाली पर अब आम जनता का रत्ती भर भी विश्वास नहीं रह गया है। यह अविश्वास निराधार नहीं है। जिस सीआईडी ने सीजीएल परीक्षा धोखाधड़ी में दुर्भावनापूर्ण तरीके से जांच की प्रकृति ही बदल दी और अपनी नाकामी व असली दोषियों को छिपाने के लिए सारा दोष नेपाल में कोचिंग लेने वाले छात्रों पर मढ़ दिया, उससे जेपीएससी घोटाले में न्याय की उम्मीद करना पूरी तरह बेमानी है। वास्तविकता तो यह थी कि सीजीएल के अधिकांश प्रश्न पिछले प्रश्नपत्रों से हूबहू उठाए गए थे और चयनित ‘खास’ उम्मीदवारों को पहले से ही उन सवालों की कोचिंग दे दी गई थी, लेकिन सीआईडी ने ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक को गुमराह किया और अहम साक्ष्य छिपा लिए।
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि सीआईडी की निष्पक्षता और नीयत पर जनता का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। सीजीएल परीक्षा घोटाले का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण साक्ष्यों को छिपाकर और कोर्ट को गुमराह करके सारा दोष नेपाल में कोचिंग लेने वाले छात्रों पर मढ़ दिया गया। इसी तर्ज पर अब जेपीएससी घोटाले में भी मुख्य आरोपियों को बचाने के लिए एक कमजोर एफआईआर दर्ज की गई है। जेपीएससी अध्यक्ष से कई बार पूछताछ के बाद भी गिरफ्तारी न होना और निजी एजेंसियों को मोहरा बनाना इस बात का प्रमाण है कि सीआईडी जांच की आड़ में साक्ष्यों को नष्ट करने का काम कर रही है।
अपने दूसरे पोस्ट में उन्होंने सीआईडी प्रमुख और एडीजी मनोज कौशिक के अतीत को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि 2013 से 2015 के बीच हजारीबाग एसपी रहते हुए मनोज कौशिक पर कोयला चोरी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे, जिसकी पुष्टि तत्कालीन आईजी मुरारीलाल मीणा की रिपोर्ट और बाद में एसीबी की निष्पक्ष जांच में भी हुई थी। एसीबी ने तो उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार से अनुमति भी मांगी थी।
बाबूलाल ने आरोप लगाया कि दो-दो जांच रिपोर्टों में दागी पाए जाने के बावजूद सरकार ने उन्हें सीआईडी जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी है। राज्य में पुलिस महकमे और अवैध कारोबार का वास्तविक नियंत्रण डीजीपी के बजाय उन्हीं के पास है। उन्होंने कहा कि सरकार जानबूझकर ऐसे अफसरों को अहम पदों पर बैठाती है ताकि राजनीतिक आकाओं के इशारे पर जांच की दिशा भटकाई जा सके। अगर सरकार की नीयत साफ है, तो उसे इस पूरे महाघोटाले की निष्पक्ष जांच सीबीआई से करानी चाहिए।

