किसी पिता का सपना होता है कि उसका बेटा जिंदगी में कुछ बड़ा करे, लेकिन जब बेटे की आंखों में उस सपने की चमक तक न हो, तब उसे हकीकत में बदलने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है? झारखंड के विकेटकीपर-बल्लेबाज कुमार कुशाग्र की कहानी कुछ ऐसी ही है। यहां एक पिता ने न सिर्फ बेटे के लिए सपना देखा, बल्कि उसे पूरा करने के लिए खुद क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा।

उन्हें न क्रिकेट खेलने का अनुभव था और न ही कोचिंग का कोई औपचारिक प्रशिक्षण। फिर भी उन्होंने किताबें पढ़ीं, बड़े खिलाड़ियों के खेल का अध्ययन किया और अपने बेटे को बल्लेबाजी के गुर सिखाने में जिंदगी के 15 साल लगा दिए। अब कुमार को न्यूजीलैंड के खिलाफ वनडे सीरीज के आखिरी दो मुकाबलों के लिए भारतीय टीम में पहली बार चुना गया है। कुमार के पिता शशिकांत कुमार जमशेदपुर में जीएसटी के संयुक्त आयुक्त हैं। उन्होंने अपने बेटे में बचपन से क्रिकेट के प्रति कोई खास दिलचस्पी नहीं देखी थी। इसके बावजूद उन्होंने उसे क्रिकेटर बनाने का फैसला किया। इसकी वजह महेंद्र सिंह धोनी की सफलता थी। करीब 15 साल पहले उन्होंने देखा था कि क्रिकेट किस तरह किसी की जिंदगी बदल सकता है।
शशिकांत ने कहा, ‘अगर आप दुनिया को देखें, तो क्रिकेट में सब कुछ है- शोहरत, नाम और अच्छी जीवनशैली। आपको जो कुछ चाहिए, वह सब क्रिकेट में है। इसलिए मैंने सोचा कि हमें जिंदगी में कुछ नया करना चाहिए।’ कुमार जब छह साल के थे, तभी पिता ने उन्हें क्रिकेट सिखाना शुरू कर दिया। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी थी, लेकिन उन्होंने बेटे को किसी क्रिकेट अकादमी में भेजने के बजाय खुद उसे प्रशिक्षित करने का फैसला किया। उनका लक्ष्य साफ था- बेटे को एक दिन भारत की जर्सी में खेलते देखना।
शशिकांत ने स्वीकार किया कि कई बार कुमार क्रिकेट खेलने के लिए तैयार भी नहीं होते थे। उन्होंने कहा, ‘कुमार को क्रिकेट में कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन मैंने उसे खिलाया। बचपन में कई बार वह मेरी बात भी नहीं सुनता था, लेकिन मैं उससे कहता था कि तुम्हें हर हाल में खेलना है। मैंने जिंदगी में कभी क्रिकेट नहीं खेला था। न बल्ला पकड़ा था, न गेंद छुई थी। लेकिन मेरा इरादा था कि हमें दुनिया में ऐसा कुछ करना है कि लोग हमें पहचानें।’ कुमार को क्रिकेट सिखाने के लिए उनके पिता ने पहले खुद सीखने का रास्ता चुना। उन्होंने बड़े क्रिकेटरों की किताबें पढ़ीं। बॉब वूल्मर और डॉन ब्रैडमैन जैसे दिग्गजों के अनुभवों से बल्लेबाजी की बारीकियां समझीं। राहुल द्रविड़ और वीरेंद्र सहवाग की बल्लेबाजी के वीडियो देखकर शॉट खेलने के तरीके सीखे। फिर हर शॉट को लिखकर उसकी तकनीक पर काम किया।
इस प्रक्रिया में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ाई के दौरान इतिहासकार रोमिला थापर से मिली सीख भी काम आई। शशिकांत ने वहां से एमए किया था। थापर पढ़ाई के दौरान किसी विषय पर गहराई से शोध करने पर जोर देती थीं। पिता ने इसी तरीके को क्रिकेट में अपनाया। उन्होंने कहा, ‘मैंने जेएनयू से पढ़ाई की थी। रोमिला थापर हमें पढ़ाती थीं और किसी भी विषय पर गहराई से शोध करने पर बहुत जोर देती थीं। मुझे यह बहुत अच्छा लगता था। इसलिए हमने क्रिकेट में भी वही तरीका अपनाया। हमें शोध करना था कि चीजें कैसे होती हैं, हाथ कहां रहना चाहिए, उंगलियों की स्थिति क्या होनी चाहिए और कलाई का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए। हमने क्या काम करता है और क्या नहीं, इस पर विस्तार से अध्ययन किया। अब उसे अपने खेल की अच्छी समझ है।’
पिता नेट्स पर कुमार को तेज गेंदबाजी और स्पिन, दोनों का अभ्यास कराते थे। पुल शॉट से लेकर ड्राइव तक, हर शॉट के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते थे। यह सिर्फ पिता-पुत्र का अभ्यास नहीं था, बल्कि एक ऐसा सफर था जिसमें पिता भी हर दिन कुछ नया सीख रहे थे। कुमार की बल्लेबाजी के साथ विकेटकीपिंग भी विकसित हुई। शशिकांत ने 12 साल की उम्र में उन्हें रणजी खिलाड़ियों के सामने विकेटकीपिंग करानी शुरू कर दी, ताकि उनके भीतर का डर खत्म हो सके। तेज गेंदबाजों के सामने स्टंप के करीब खड़ा करना भी इसी कोशिश का हिस्सा था।
शशिकांत ने बताया कि वह बेटे को चोट लगने पर भी समझाते थे कि इससे जिंदगी खत्म नहीं हो जाती। शुरुआत में कुमार को विकेटकीपिंग भी पसंद नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसे सीख लिया। राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) में जाने और दूसरे खिलाड़ियों की जिंदगी देखने के बाद कुमार की गंभीरता भी बढ़ने लगी। कुमार ने झारखंड में उम्र-वर्ग क्रिकेट से शुरुआत की और धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए। 19 साल की उम्र में वह सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के टारगेट पूल में शामिल हुए। 2024 में उन्हें भारत ए टीम में जगह मिली। आईपीएल नीलामी में दिल्ली कैपिटल्स ने उन्हें 7.2 करोड़ रुपये में खरीदा, जबकि पिछले सत्र में गुजरात टाइटंस ने उन्हें 65 लाख रुपये में अपने साथ जोड़ा।
अब न्यूजीलैंड के खिलाफ वनडे सीरीज के आखिरी दो मैचों के लिए भारतीय टीम में उनका चयन इस लंबे सफर का एक बड़ा पड़ाव है। यह उनके पिता के उस सपने की ओर बढ़ता कदम भी है, जिसे उन्होंने तब देखा था, जब बेटे को खुद क्रिकेट में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। शशिकांत के मुताबिक, आज कुमार अपने खेल को लेकर काफी प्रेरित हैं और अब भी अभ्यास के लिए उनके पास आते हैं। पिता का कहना है कि वह अपने बेटे के खेल को किसी और से बेहतर समझते हैं। कुमार की कहानी सिर्फ क्रिकेट में मिली सफलता की कहानी नहीं है। यह उस पिता की कहानी भी है, जिसने बेटे के सपने को आकार देने के लिए पहले खुद सीखना शुरू किया। अब जब भारतीय टीम का बुलावा आया है, तो उस उपलब्धि के पीछे वर्षों की पढ़ाई, अभ्यास, अनुशासन और पिता-पुत्र की साझा मेहनत भी खड़ी है।


