रांची: झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत नोटिस की सुनवाई और मामलों के निष्पादन में रांची समेत कई जिलों की रफ्तार काफी धीमी बनी हुई है। 6 अक्टूबर तक ईआरओ और एईआरओ द्वारा सुनवाई के बाद के आंकड़े इसीइनेट पर अपलोड एवं अपडेट किए गए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, मैपिंग, लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी और अन्य श्रेणियों में कुल 58.14 लाख मामले अब भी निष्पादन के लिए लंबित हैं।

इन लंबित मामलों में मुख्य रूप से तीन श्रेणियां शामिल हैं। नो मैपिंग श्रेणी के 10,14,785 मामले लंबित हैं। इसमें ऐसे मतदाताओं के मामले आते हैं, जिनका वर्तमान मतदाता रिकॉर्ड वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मैप नहीं हो पाया है। लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के 25,13,993 मामले लंबित हैं। इसमें ऐसे मामले शामिल हैं, जिनमें मतदाता और पुराने मतदाता रिकॉर्ड के बीच उपलब्ध विवरण में तार्किक विसंगति पाई गई है। अन्य श्रेणियों के 22,84,949 मामले लंबित हैं। इसमें ऐसे मतदाता आते हैं, जिन्होंने नोटिस के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया है और न ही किसी तरह के कागजात पेश किए हैं।
लोहरदगा की स्थिति सबसे बेहतर
सभी श्रेणियों के मामलों के निष्पादन के मामले में लोहरदगा जिले की स्थिति सबसे बेहतर बताई गई है। वहीं दूसरी ओर, रांची में नो मैपिंग के 14.37% और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के 23.81% मामलों का ही निष्पादन हो पाया है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी झारखंड के रवि कुमार के अनुसार, हर पात्र भारतीय नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल करना और सूची को शुद्ध, समावेशी व त्रुटिरहित बनाना प्राथमिकता है, जिसमें सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों से सक्रिय सहयोग की अपेक्षा है।
एसआईआर का फैसला सर्वसम्मति से
दूसरी ओर, नई दिल्ली में निर्वाचन आयोग ने एसआईआर को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में 15 बिंदुओं वाला जवाबी हलफनामा दाखिल किया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर लागू करने के तीनों आदेश (जून 2025, अक्टूबर 2025 व मई 2026) मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और दोनों निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी द्वारा सर्वसम्मति से मंजूर किए गए थे।
आयोग ने कोर्ट में यह भी दलील दी है कि एसआईआर के तीनों आदेश और शीर्ष अदालत में दाखिल हलफनामा सभी आयुक्तों की सर्वसम्मति से पारित हैं। साथ ही स्पष्ट किया गया है कि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं हुआ है, एसआईआर का घोषणा पत्र एक अलग दस्तावेज है। मतदाताओं के सत्यापन के दौरान रिकॉर्ड न मिलने पर बीएलओ घर जाकर दस्तावेज लेंगे और किसी को भी सुनवाई के लिए नहीं बुलाया जाएगा। नाम हटाने की व्यवस्था के तहत ईइनेट से नाम केवल ईआरओ के आदेश पर ही हटेगा और इसकी जांच के लिए समिति बनी है।


