शोध का असली मतलब क्या है? डॉ. जे.बी. पाण्डेय ने बताया ऐसा सच, जिसे हर रिसर्च स्कॉलर को जानना चाहिए

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा में व्याख्यान के दौरान डॉ जंग बहादुर पाण्डेय ने शोध को सत्यान्वेषण बताते हुए छात्रों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जिज्ञासा के साथ अध्ययन करने का संदेश दिया।

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आरा: वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के हिंदी विभाग में गुरुवार को पीएच.डी. कोर्स के तहत शोधार्थियों के लिए एक खास व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। “शोध दृष्टि और सृष्टि” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। अपने संबोधन में डॉ. पाण्डेय ने शोध को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि “शोध असल में सत्यान्वेषण है”, यानी सत्य की खोज। उन्होंने बताया कि इंसान की जरूरतें ही आविष्कार को जन्म देती हैं। जैसे-जैसे जरूरतें बढ़ीं, वैसे-वैसे नए-नए आविष्कार होते गए और इसी के साथ मानव सभ्यता आगे बढ़ती चली गई।

उन्होंने मानव विकास के पांच चरणों-पाषाण युग, पशुपालन युग, कृषि युग, औद्योगिक युग और सूचना क्रांति युग—का जिक्र करते हुए बताया कि यह पूरा इतिहास एक तरह से शोध का ही परिणाम है। उन्होंने अल्विन टॉफलर की किताब थर्ड वेव का हवाला देते हुए तीन बड़ी क्रांतियों-कृषि, औद्योगिक और सूचना क्रांति की भी चर्चा की। साथ ही उनकी 1970 में प्रकाशित पुस्तक फ्यूचर शॉक का भी उल्लेख किया। डॉ. पाण्डेय ने आगे कहा कि शोध सिर्फ नए तथ्यों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि उन तथ्यों की तार्किक और वैज्ञानिक व्याख्या भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने कहा, “ज्ञात साधनों के जरिए अज्ञात को निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से समझना ही शोध है।” उन्होंने शोध की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया कि यह जिज्ञासा, आवश्यकता, योग्यता, तत्परता, कर्मठता, श्रद्धा, विश्वास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जैसे कई चरणों से होकर गुजरती है।

अपने विचारों को मजबूत करने के लिए उन्होंने कालिदास के मालविकाग्निमित्रम् का उदाहरण दिया और समझाया कि हर पुरानी चीज अच्छी नहीं होती और हर नई चीज खराब नहीं होती। समझदार व्यक्ति हर बात को परखकर ही स्वीकार करता है, जबकि मूर्ख बिना सोचे-समझे दूसरों की बात मान लेते हैं। इसलिए शोध में आंख मूंदकर किसी बात को स्वीकार करने की कोई जगह नहीं है। इस मौके पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शोध में ईमानदारी सबसे जरूरी है, साथ ही गुरु के प्रति आस्था और विश्वास भी होना चाहिए। उन्होंने तुलसीदास की पंक्ति-“गुरु बिनु भव निधि तरै न कोई” का उल्लेख करते हुए गुरु के महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम में विभाग के शिक्षक डॉ. रण विजय कुमार, डॉ. नवनीत कुमार, डॉ. नीलांबुज सिंह, डॉ. शिखा सिंह और एस.पी. जैन कॉलेज की हिंदी शिक्षिका डॉ. आभा कुमारी की उपस्थिति ने आयोजन को और खास बना दिया।

इस दौरान डॉ. जे.बी. पाण्डेय ने हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. बज्रांग प्रताप केशरी को रांची विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका “अनुवाक्” की प्रति भेंट कर सम्मानित किया। इस पर शोधार्थियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया। कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों का स्वागत हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. बज्रांग प्रताप केशरी ने किया। छात्रों ने मंगलाचरण और स्वागत गान प्रस्तुत किया। संचालन डॉ. नीरज कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मुकेश कुमार ने दिया। अंत में राष्ट्रगान और शांति पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।