झारखंडी अस्मिता और जनजातीय समुदाय के हक की लड़ाई के अग्रदूत थे बाबा कार्तिक उरांव | बाबा कार्तिक उरांव | Baba Kartik Oraon

झारखंड की अस्मिता, जनजातीय अधिकार और आत्मसम्मान की लड़ाई को नई दिशा देने वाले दूरदर्शी नेता बाबा कार्तिक उरांव का जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक न्याय का अमर प्रेरक अध्याय है।

News Aroma
6 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now
  • बाबा कार्तिक उरांव का जन्म गुमला के लिटाटोली में 29 अक्टूबर 1924 को हुआ था

  • उनके पास इंजीनियरिंग की नौ डिग्रियां थीं

  • वर्ष 1959 में उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमेटिक पावर स्टेशन हिंकले न्यूक्लियर पावर प्लांट का प्रारूप ब्रिटिश सरकार को दिया

  • बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान था

दयानंद राय

सदियां लगती हैं बाबा कार्तिक उरांव होने में
खुदा देता भी है हीरा तो बहुत वक्त लेकर

ये पंक्तियां पंखराज बाबा कार्तिक उरांव पर बिल्कुल ठीक बैठती हैं। अंग्रेजी शासनकाल में जब भारत आजादी का सपना देखा करता था, हमारे क्रांतिकारी उसके लिए लड़ते हुए अपने जीवन की शहादत देते थे। झारखंड की माटी में एक ऐसा लाल पैदा हुआ जिसने अपनी प्रतिभा से देश ही नहीं विदेश में भी अपनी पहचान बनायी। भारत मां के ऐसे सपूत का नाम था बाबा कार्तिक उरांव। वे झारखंडी अस्मिता और जनजातीय समुदाय के हक की लड़ाई के अग्रदूत थे। कार्तिक उरांव का जन्म गुमला के लिटाटोली में 29 अक्टूबर 1924 को हुआ था। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी कार्तिक ने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में महारत हासिल कर देश में नाम कमाया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा खोरा के जामटोली स्कूल में हुई। 1948 में बीएससी इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की।

1950 में बिहार सरकार के सिंचाई विभाग में सहायक अभियंता नियुक्त हुए। उसी वर्ष ईचा ग्राम निवासी तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर स्व. तेजू भगत की सुपुत्री सुमती उरांव से उनका विवाह हुआ। 1952 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। 1959 में दुनिया के सबसे बड़े ऑटोमेटिक पावर स्टेशन का प्रारूप ब्रिटिश सरकार को दिया। जो आज हिंकले न्यूक्लियर पावर प्वाइंट के साथ विद्यमान है।

नौ वर्षों तक विदेश में रहने के बाद मई 1961 में स्वदेश लौटे। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी इनकी प्रतिभा को सराहा और रांची के एचईसी में सुपरिटेंडेंट कंस्ट्रक्शन के पद पर नियुक्ति की अनुशंसा की गई। बाद में उन्हें डिप्टी चीफ इंजीनियर डिजायनर के रूप में प्रोन्नति दी गई। इसके बाद 1962 में तृतीय लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े। 1967 में चौथी लोकसभा चुनाव में लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। 1971 के लोस चुनाव में पुन: भारी बहुमत से जीते। बाबा कार्तिक उरांव ने जनजाति समाज के अधिकार, अस्मिता और विकास के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनका जीवन सामाजिक न्याय, शिक्षा और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया।

भारत के जननायक बाबा कार्तिक उरांव का नाम जनजाति समाज के गौरव और संघर्ष की पहचान है। उन्होंने उस दौर में आवाज उठाई जब जनजाति समुदाय के हक और अस्तित्व को अक्सर अनदेखा किया जाता था। बाबा कार्तिक उरांव ने जनजातियों की जमीन की सुरक्षा को जीवन का मिशन बनाया। उन्होंने भूदान आंदोलन के दौरान लूटी गई जमीनें वापस दिलाने के लिए “भूमि वापसी अधिनियम” बनवाया। यह कदम जनजाति समाज के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। उनके प्रयासों से हजारों लोगों को उनकी जमीन दोबारा मिली और आत्मनिर्भरता की राह खुली। वे जानते थे कि बिना जमीन और शिक्षा के समाज का भविष्य नहीं बन सकता। इसलिए उन्होंने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।

इस संस्था ने क्षेत्र के किसानों और युवाओं को आधुनिक कृषि तकनीक से जोड़ा। बाबा कार्तिक उरांव ने न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक भागीदारी में जनजातीय प्रतिनिधित्व की लड़ाई लड़ी। उन्होंने 1972 में रांची में पटना हाईकोर्ट की अस्थायी खंडपीठ के गठन के लिए प्रयास शुरू किए, जो 1976 में स्थायी रूप से स्थापित हुई। उन्होंने छोटानागपुर और संताल परगना विकास प्राधिकरण के गठन की भी पहल की और इसके पहले उपाध्यक्ष बने। इससे जनजातीय समाज को शासन और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का अवसर मिला। उनकी दूरदर्शिता से “ट्राईबल सब प्लान” नीति अस्तित्व में आई।

इस योजना ने जनजाति बहुल क्षेत्रों के विकास को नीति निर्धारण के केंद्र में लाने का काम किया। इसके अलावा, उन्होंने 1968 में “अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद” की स्थापना की, जो शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में काम करती रही। बाबा कार्तिक उरांव ने कन्वर्जन के खिलाफ ठोस रुख अपनाया। उन्होंने संसद में कहा था कि जो लोग धर्म बदल चुके हैं, उन्हें जनजातीय आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनका मानना था कि जनजाति समाज की सांस्कृतिक जड़ें भारतीय सनातन परंपरा से जुड़ी हैं। उन्होंने जनजातियों को अपनी पहचान, परंपरा और आस्था पर गर्व करने का संदेश दिया।

बाबा कार्तिक उरांव का जीवन समाज के हर वर्ग के लिए प्रेरणा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई राष्ट्रीय नेताओं ने उन्हें जनजाति सशक्तिकरण का प्रतीक बताया है। उनकी नीतियों और विचारों ने आने वाली पीढ़ियों को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान की राह दिखाई।

उनकी सोच थी कि “विकास तभी सार्थक है जब समाज का सबसे पिछड़ा व्यक्ति भी उसमें शामिल हो।” यही सोच आज भी देश के विकास के केंद्र में बनी हुई है।
बाबा कार्तिक उरांव ने अपने कर्म, नीतियों और साहस से दिखा दिया कि संघर्ष की राह कठिन जरूर होती है, लेकिन न्याय और आत्मसम्मान की जीत निश्चित होती है। उनका जीवन आज भी हर उस व्यक्ति के लिए प्रकाशस्तंभ है जो अपने समाज के अधिकारों के लिए खड़ा होना चाहता है।

Share This Article