चतरा एयर एम्बुलेंस हादसा: चंद मिनटों में बिखर गई 7 जिंदगियां, जानिए हादसे की पूरी कहानी

Vinita Choubey
4 Min Read
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चतरा : झारखंड के चतरा जिले में सिमरिया के घने जंगलों से जब धुआं उठता दिखा, तो वह सिर्फ एक विमान के गिरने का संकेत नहीं था। वह सात परिवारों की उम्मीदों के राख हो जाने की खबर थी। इस एयर एंबुलेंस हादसे ने सात जिंदगियां छीन लीं और पीछे छोड़ गया कर्ज, टूटे सपने और गहरा मातम। जिन घरों में यह खबर पहुंची, वहां चीख-पुकार मच गई। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उन परिवारों के संघर्ष का अंत था, जिन्होंने अपने सपनों की नींव कर्ज पर रखी थी।

जमीन बिकी, कर्ज लिया… लेकिन बेटा नहीं बचा

इस हादसे में जान गंवाने वाले रांची सदर अस्पताल के डॉ. विकास कुमार गुप्ता की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं, फर्क बस इतना है कि इसका अंत बेहद दर्दनाक है। बिहार के औरंगाबाद के रहने वाले उनके पिता बजरंगी प्रसाद ने बेटे को डॉक्टर बनाने के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन बेच दी। भारी कर्ज लिया और विकास को ओडिशा के कटक से एमबीबीएस की पढ़ाई कराई।बेटे की मौत के बाद पिता की आवाज भर्रा जाती है। वे कहते हैं, “लोग कहते थे इतना कर्ज मत लो… लेकिन मुझे भरोसा था कि बेटा पढ़ जाएगा तो सब चुका देगा।अब कर्ज बाकी है, लेकिन उसे चुकाने  बेटा नहीं। पीछे रह गया सात साल का मासूम बेटा, जो पिता के साए से महरूम हो गया।

होटल में लगी आग, और  उम्मीदें उड़ चलीं

इस हादसे का दूसरा दर्दनाक चेहरा संजय कुमार थे। चंदवा में छोटा-सा होटल चलाने वाले संजय पिछले हफ्ते शॉर्ट सर्किट से लगी आग में बुरी तरह झुलस गए थे। इलाज में परिवार की सारी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी थी। रांची के डॉक्टरों ने बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जाने की सलाह दी। लेकिन वहां तक पहुंचना आसान नहीं था। एयर एंबुलेंस ही एकमात्र रास्ता था और उसके लिए 7.5 से 8 लाख रुपये की जरूरत थी। संजय के भाई अजय बताते हैं कि पैसे जुटाने के लिए उन्होंने जमीन-आसमान एक कर दिया। कुछ रिश्तेदारों ने मदद की, कुछ ने ब्याज पर पैसे दिए। परिवार को भरोसा था कि दिल्ली पहुंचते ही संजय ठीक हो जाएंगे और फिर धीरे-धीरे कर्ज चुका देंगे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

मामा के लिए छोड़ा सपना, खुद की जिंदगी भी गई

विमान में 17 साल का ध्रुव कुमार भी सवार था। सिमडेगा का रहने वाला ध्रुव मोबाइल इंजीनियरिंग में करियर बनाना चाहता था। वह पढ़ाई कर रहा था और अपने भविष्य को लेकर उत्साहित था। जब उसे पता चला कि उसके मामा संजय को दिल्ली ले जाया जा रहा है, तो उसने अपनी पढ़ाई और योजनाएं रोक दीं। वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। अपनों की जान बचाने की कोशिश में वह खुद मौत की आगोश में चला गया।

वो आखिरी 23 मिनट…

शाम 7:11 बजे विमान ने रांची एयरपोर्ट से उड़ान भरी। शुरुआत में सब सामान्य था। लेकिन कुछ ही देर में मौसम अचानक बिगड़ गया। तेज हवाएं और धुंध ने हालात कठिन बना दिए। उड़ान के महज 23 मिनट बाद ही एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) से संपर्क टूट गया। विमान सिमरिया के दुर्गम जंगलों में जा गिरा। हादसा इतना भीषण था कि मलबे तक पहुंचने के लिए रेस्क्यू टीम और एसएसबी के जवानों को करीब 4 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। जंगल की खामोशी में बिखरे विमान के टुकड़े सिर्फ एक दुर्घटना की कहानी नहीं कह रहे थे, वे उन संघर्षों की भी गवाही दे रहे थे जो इन परिवारों ने अपने अपनों को बचाने के लिए किए।

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