झारखंड की पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ थे आदरणीय हरिनारायण सिंह सर

दयानंद राय ने अपने शिक्षक और वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह सर को याद किया, उनके नेतृत्व, विनम्रता और पत्रकारिता में नैतिकता से सीख लेकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

Vinita Choubey
3 Min Read
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दयानंद राय
12 मार्च को आदरणीय हरिनारायण सिंह सर की जयंती थी। उस रोज चाह कर भी उनकी स्मृति में कुछ नहीं लिख सका, लेकिन लिखने की इच्छा बलवती रही। आज फिर वक्त ने मौका दिया तो सोचा उन्हें शब्दाजंलि दे दूं क्योंकि उनके नेतृत्व में मैंने काम किया और उनसे बहुत कुछ सीखा। हरि सर की सबसे अच्छी बात ये थी कि बहुत कद्दावर शख्सियत होने के बाद भी उनमें दिखावा नाम की चीज नहीं थी। उन्होंने अपनी शख्सियत को संघर्षों से निखारा था और झारखंड की पत्रकारिता में शिखर पुरुष की ऊंचाई हासिल की थी। इसलिए अपने साथ काम करनेवाले लोगों से वे कड़ी मेहनत की अपेक्षा करते थे। उनकी टाइपिंग स्किल का मैं कायल था, उनकी तरह लाइटनिंग स्पीड में टाइप करने वाला संपादक मेरी नजर में दूसरा नहीं गुजरा है। उन्हें याद करते हुए जब उनकी भूमिकाओं पर नजर डालता हूं तो याद आता है कि हिन्दुस्तान में जिस सख्त छवि के वो संपादक थे, वो आजाद सिपाही में आकर विनम्रता से भर उठा था। एक बाद हिन्दुस्तान में जब मैं बिजनेस डेस्क पर था तो उन्होंने मुझे लेट आने के लिए डांटा था, इसके बाद मैं लगभग समय से ही ऑफिस आता था। हिन्दुस्तान के बाद आजाद सिपाही में करीब दो साल तक मैंने उनके नेतृत्व में काम किया और मुझे इसका अंदाजा हो गया कि हरि सर असीमित ऊंचाई के व्यक्ति, पत्रकार और संपादक हैं। अपने कुशल नेतृत्व में उन्होंने हिन्दुस्तान अखबार को रांची में प्रभात खबर को टक्कर देनेवाला बना दिया था।कई पत्रकारों को नौकरी दी और गाहे-बगाहे उनके काम आते रहे। राजनेताओं से उनके मधुर संबंध थे और अक्सर राजनीति के धुरंधर उनसे मिलने ऑफिस में आते रहते थे।

हरि सर से मैंने क्या सीखा

अब कनक्लूजन पर आता हूं। हरि सर से जो सबसे महत्वपूर्ण बात मैंने सीखी वो ये थी कि ताकत होने पर विनम्र हो जाना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि सबसे ताकतवर आदमी सबसे सहज और सरल होता है और उसमें समंदर सी गहराई होती है। यह सीखा कि अपने दम पर पत्रकारिता का संस्थान कैसा खड़ा किया जा सकता है। यह भी सीखा की पत्रकारिता में किस हद तक नैतिक होना चाहिए और कहां व्यवहारिक हो जाना चाहिए। लोगों की मदद करनी चाहिए पर वे आपका अनुचित लाभ उठाने लगें ऐसा भी नहीं होना चाहिए। अपने हुनर को हमेशा मांजते रहना चाहिए। परफेक्शन हासिल करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए। और अंत में आप सबसे ये कहना चाहता हूं कि मैं उनको श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता था इसलिए मैं कुछ लिखने का बहाना ढूंढ रहा था।

आदरणीय हरिनारायण सिंह सर, विनम्र श्रद्धांजलि।

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