
दयानंद राय
मुझे इस बात का एक किस्म का गर्व है कि मैं हरिवंश जी की पत्रकारिता की कक्षाओं का छात्र रहा। भले ही वे कक्षाएं प्रभात खबर इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज में दो से चार दिनों की ही क्यों न रही हों। मुझे याद है कि जब मैं पत्रकारिता का छात्र था तो हरिवंश जी कोकर स्थित पीकेआइएमएस में कक्षाएं लेने के लिए आते थे, तब वे प्रभात खबर के प्रधान संपादक हुआ करते थे।
मैं यहां यह खास तौर से रेखांकित करना चाहूंगा कि मैं तब उनके विचारों से सहमत नहीं हुआ करता था और प्रभात खबर में छपे उनके एकाधिक आलेखों में व्यक्त विचारों की मैंने आलोचना की थी और वे आलोचनाएं प्रभात खबर में छपी थीं। जिस वजह से मैं हरिवंश जी की इज्जत करता हूं वह ये थी कि अगर वे चाहते तो मेरी आलोचनाओं को बतौर प्रधान संपादक वे रोक सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मैं मानता हूं कि वे असहमति और आलोचना को स्वीकारना जानते थे और यह कोई साधारण बात नहीं है। मैंने प्रभात खबर में हरिवंश सर का दौर देखा है और अब जब वे प्रभात खबर में नहीं हैं तब प्रभात खबर में की जा रही पत्रकारिता को भी देख रहा हूं।
उस दौर में हरिवंश सर प्रभात खबर के सभागार में झारखंड और देश की कई सम्मानित हस्तियों को बुलाकर उनका व्याख्यान कराते थे और उनसे एक नई दृष्टि लोगों को मिलती थी।मुझे आज ये कहने में कोई संकोच नहीं की हरिवंश सर पत्रकारिता के भी दिग्गज थे और राजनीति के भी बने हुए हैं। वे समय की नब्ज पकड़ना जानते हैं और सत्ता प्रतिष्ठान में लंबे समय तक बने रहने और पकड़ बनाने की कला भी जानते हैं। प्रभात खबर जैसे किसी अखबार को प्रभात खबर बनाने का श्रेय निश्चित रूप से उनको जाता है। प्रभात खबर के परिसर में उनसे मेरी कई मुलाकातें हुईं और हर बार उनके चेहरे पर मुस्कान हुआ करती थी।
हरिवंश सर नायक थे, नायक हैं और रहेंगे। उनका कद मेरी नजर में कल भी ऊंचा था और आज तो उससे भी ऊंचा है। सर का राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से उन्हें राज्यसभा में नोमिनेट करना मेरे लिए हर्ष का विषय है।
आदरणीय हरिवंश नारायण सिंह सर को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

