


सतीश गुप्ता





हिमाचल : हिमाचल की पहाड़ियों में कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां प्रकृति केवल सुंदर नहीं होती—वह अपने भीतर सदियों की कहानियां भी संजोए रहती है। शिमला जिले की पब्बर घाटी में स्थित हाटकोटी ऐसा ही एक अद्भुत स्थान है।
पब्बर नदी के शांत किनारे, देवदारों और पहाड़ों से घिरी इस घाटी में विराजमान है माता हाटेश्वरी का प्राचीन मंदिर। पहली नजर में यह एक सुंदर पहाड़ी मंदिर दिखाई देता है, लेकिन इसके पत्थरों, मूर्तियों और लोककथाओं के भीतर हिमाचल के इतिहास का एक लंबा अध्याय छिपा हुआ है।
लगभग एक हजार वर्ष पुरानी विरासत
हाटकोटी के मंदिरों की स्थापत्य शैली और पत्थर की अद्भुत नक्काशी इन्हें हिमालय के प्राचीन मंदिर स्थापत्य की महत्वपूर्ण कड़ियों में शामिल करती है। इनके निर्माणकाल को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं, लेकिन मुख्य हाटेश्वरी मंदिर को सामान्यतः प्रारंभिक मध्यकाल से जोड़ा जाता है।
पत्थर से बना इसका शिखर, अलंकृत द्वार और मूर्तिकला उस युग के कलाकारों की असाधारण प्रतिभा की गवाही देते हैं।
यह कल्पना करना भी रोमांचित करता है कि जब आज की सड़कें नहीं थीं, जब इन पहाड़ों में यात्रा पैदल और कठिन रास्तों से होती थी, तब भी इस दुर्गम घाटी में इतनी विकसित स्थापत्य कला का निर्माण हुआ था।
गर्भगृह में महिषासुरमर्दिनी
मंदिर की आत्मा है माता हाटेश्वरी की प्राचीन अष्टभुजी प्रतिमा।
माता को महिषासुरमर्दिनी, अर्थात महिषासुर का वध करने वाली देवी, के रूप में पूजा जाता है। प्रतिमा की मुद्रा, हाथों में धारण किए आयुध और उसके आसपास की सूक्ष्म शिल्पकला इसे अत्यंत विशिष्ट बनाती है।
स्थानीय आस्था के अनुसार जब महिषासुर के अत्याचारों से देवता और मानव त्रस्त हुए, तब देवी ने उसका संहार किया। इसी विजय की स्मृति में यहां शक्ति के इस स्वरूप की पूजा होती है।
इतिहास इस कथा की पुष्टि नहीं करता, लेकिन सदियों से चली आ रही यह धार्मिक परंपरा आज भी हाटकोटी की पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
दो बहनों की रहस्यमयी कहानी
हाटकोटी की लोकस्मृति में एक और अत्यंत मार्मिक कथा मिलती है—दो संन्यासी बहनों की।
कहा जाता है कि दोनों बहनों ने सांसारिक जीवन त्याग दिया था और लोगों की सेवा करती हुई विभिन्न स्थानों पर घूमती थीं। बड़ी बहन हाटकोटी पहुंचीं और यहां साधना में लीन हो गईं।
लोककथा के अनुसार एक दिन वह इसी स्थान पर अदृश्य हो गईं और लोगों ने इसे देवी के रूप में उनके प्रकट होने से जोड़ा।
बाद में इस दिव्य घटना की खबर जुब्बल के राजा तक पहुंची और माता के सम्मान में मंदिर का निर्माण कराया गया।
यह कथा इतिहास की प्रमाणित घटना से अधिक लोकविश्वास है, लेकिन यही लोककथाएं किसी स्थान को केवल पुरातात्विक स्थल नहीं रहने देतीं—वे उसे जीवित संस्कृति में बदल देती हैं।
पांडवों के पदचिह्न?
मंदिर परिसर में कुछ छोटे-छोटे प्राचीन पत्थर के मंदिर भी दिखाई देते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग “पांडव देओल” या “पांडवों के खिलौने” कहते हैं।
मान्यता है कि वनवास के दौरान पांडव यहां आए थे और उन्होंने देवी की आराधना की थी।
क्या वास्तव में पांडव यहां आए थे?
इसका कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन हिमाचल के अनेक प्राचीन मंदिरों की तरह हाटकोटी में भी पांडवों से जुड़ी परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।
इतिहास जहां प्रमाण मांगता है, वहीं लोकस्मृति अपने तरीके से अतीत को जीवित रखती है।
शिव और शक्ति का संगम
हाटेश्वरी मंदिर के निकट स्थित प्राचीन शिव मंदिर इस स्थल के धार्मिक महत्व को और बढ़ाता है।
यहां शिवलिंग और प्राचीन शिल्पकृतियां दिखाई देती हैं। एक ही परिसर में शिव और शक्ति की उपासना हिमालय की उस प्राचीन धार्मिक परंपरा की याद दिलाती है, जिसमें देवी और शिव एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही आध्यात्मिक परंपरा के दो रूप माने जाते हैं।
जंजीर से बंधा तांबे का रहस्य
हाटकोटी की सबसे दिलचस्प किंवदंतियों में से एक है मंदिर परिसर में रखा विशाल तांबे का पात्र, जो लोहे की जंजीर से बंधा हुआ है।
स्थानीय कथा के अनुसार कभी पब्बर नदी में ऐसे दो तांबे के पात्र दिखाई दिए थे। उनमें से एक को मंदिर में लाया गया, जबकि दूसरा बाढ़ के पानी में बह गया।
कहते हैं कि तब से बचे हुए पात्र को जंजीर से बांध दिया गया।
इससे जुड़ी कई मान्यताएं आज भी स्थानीय लोगों के बीच सुनने को मिलती हैं। चाहे इस कहानी का ऐतिहासिक प्रमाण हो या न हो, यह हाटकोटी की लोकसंस्कृति का एक आकर्षक हिस्सा जरूर है।
पब्बर नदी और मंदिर
शायद हाटकोटी की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि मंदिर और प्रकृति यहां एक-दूसरे से अलग दिखाई ही नहीं देते।
एक ओर प्राचीन पत्थरों में उकेरी गई देवी-देवताओं की आकृतियां हैं और दूसरी ओर पब्बर नदी अपनी शांत धारा में बहती रहती है।
ऊंचे पहाड़, जंगल, नदी और मंदिर—मानो प्रकृति ने स्वयं इस प्राचीन तीर्थ के लिए एक विशाल चित्रफलक तैयार किया हो।
आस्था आज भी जीवित है।
समय बदला, राजवंश बदले, रास्ते बदले और जीवनशैली बदल गई—लेकिन हाटेश्वरी माता के प्रति लोगों की आस्था आज भी कायम है।
विशेषकर नवरात्र के अवसर पर हाटकोटी में श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ उमड़ती है। आसपास के क्षेत्रों के लोगों के लिए माता केवल एक प्राचीन देवी नहीं, बल्कि उनकी कुल आस्था और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
इतिहास से कहीं अधिक…
हाटकोटी को केवल “एक हजार वर्ष पुराना मंदिर” कह देना शायद इसके महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा।
यहां इतिहास है—पत्थरों में।
आस्था है—मंदिर में।
लोककथाएं हैं—लोगों की स्मृति में।
और प्रकृति है—पब्बर की बहती धारा में।
यहां खड़े होकर लगता है कि पहाड़ केवल चुप नहीं रहते। वे बोलते हैं—बस उनकी भाषा समझने के लिए थोड़ा ठहरना पड़ता है।
शायद यही हाटकोटी का सबसे बड़ा आकर्षण है।
एक प्राचीन मंदिर, एक बहती नदी और हजारों वर्षों से चली आ रही आस्था—इन तीनों के बीच हाटकोटी आज भी अपनी कहानी सुना रहा है।
और शायद आने वाले समय में भी सुनाता रहेगा।
हाटकोटी — जहां इतिहास, आस्था और रहस्य पब्बर के किनारे आज भी साथ-साथ बहते हैं।
