सिर्फ बड़ी फिल्में नहीं, छोटी फिल्मों से भी जिंदा रहता है सिनेमा: हुमा कुरैशी

Manu Shrivastava
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हुमा कुरैशी
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अभिनेत्री हुमा कुरैशी इन दिनों अभिनय के साथ-साथ फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी अपनी नई पहचान बनाने में जुटी हैं। उन्होंने अपने भाई साकिब सलीम के साथ मिलकर आगामी एक्शन-थ्रिलर फिल्म ‘बेबी, डू डाई डू’ का निर्माण किया है, जिसमें वह मुख्य भूमिका भी निभा रही हैं। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में हुमा ने फिल्म निर्माण, बॉलीवुड के बदलते बिजनेस मॉडल और छोटी फिल्मों के भविष्य पर खुलकर अपनी राय रखी। उनका मानना है कि इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ बड़े बजट की फिल्मों पर निर्भर रहना सही रणनीति नहीं है।

छोटी फिल्मों की अहमियत | इंडस्ट्री की असली ताकत

हुमा का कहना है कि जब मध्यम या छोटे बजट की अच्छी फिल्में सिनेमाघरों में सफल होती हैं तो इससे स्वतंत्र निर्माताओं का आत्मविश्वास बढ़ता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इम्तियाज अली की फिल्मों जैसी सफलताएं यह साबित करती हैं कि दर्शक अच्छी कहानी को स्वीकार करते हैं। उनके मुताबिक, अगर केवल बड़ी फिल्मों पर ही सिनेमा टिका रहेगा तो फिल्म उद्योग का संतुलन बिगड़ जाएगा। छोटे और मझोले बजट की फिल्मों की सफलता ही नए कलाकारों, तकनीशियनों और रचनात्मक फिल्मकारों के लिए अवसर पैदा करती है।

नई कहानियों की चुनौती , पुराने फॉर्मूलों से बाहर निकलने की जरूरत

हुमा ने बॉलीवुड में नए प्रयोगों को लेकर मौजूद झिझक पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री अक्सर बदलाव की बातें तो करती है, लेकिन जब कुछ नया करने का समय आता है तो निर्माता और स्टूडियो पुराने फॉर्मूलों और आंकड़ों पर लौट जाते हैं। उनके अनुसार कई प्रतिभाशाली फिल्मकारों की शानदार कहानियां सिर्फ इसलिए पर्दे तक नहीं पहुंच पातीं क्योंकि उन्हें व्यावसायिक जोखिम मान लिया जाता है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र निर्माता सीमित संसाधनों के बावजूद नई सोच और मजबूत कंटेंट के दम पर आगे बढ़ रहे हैं।

महिला प्रधान नहीं, मनोरंजन प्रधान फिल्म

अपनी फिल्म ‘बेबी, डू डाई डू’ में हुमा एक मूक-बधिर शार्प शूटर का किरदार निभा रही हैं। उन्होंने महिला-केंद्रित फिल्मों के अलग वर्गीकरण पर असहमति जताते हुए कहा कि किसी फिल्म को सिर्फ इसलिए अलग नजर से नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि उसकी मुख्य किरदार एक महिला है। उनके मुताबिक, महिला कलाकारों की फिल्मों को भी पुरुष कलाकारों की फिल्मों जितना ही बजट, स्क्रीन और व्यावसायिक महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिलाओं की फिल्में हमेशा सामाजिक मुद्दों पर आधारित हों, यह सोच बदलने की जरूरत है। यह फिल्म पूरी तरह मनोरंजन और एक दमदार “एंग्री यंग वुमन” की कमर्शियल कहानी है।

मराठी सिनेमा से लगाव,अच्छे प्रोजेक्ट का इंतजार

हुमा कुरैशी ने मराठी सिनेमा की भी जमकर तारीफ की। साल 2015 में वह मराठी फिल्म ‘हाईवे’ में नजर आई थीं। उनका कहना है कि मौजूदा समय में मराठी फिल्म इंडस्ट्री से बेहतरीन और प्रयोगधर्मी फिल्में सामने आ रही हैं। ऐसे में यदि उन्हें कोई मजबूत कहानी और अच्छा किरदार मिलता है तो वह एक बार फिर मराठी फिल्मों में काम करना पसंद करेंगी। उनके अनुसार क्षेत्रीय सिनेमा लगातार नई सोच और उत्कृष्ट कंटेंट के जरिए भारतीय सिनेमा को समृद्ध बना रहा है।

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