
हेमंत पाल
बीते कुछ सालों में भारत के कई बड़े उद्योगपति, निवेशक और उच्च आय वर्ग के लोग तेजी से दुबई और खाड़ी देशों की ओर रुख करते दिखाई दिए। कम टैक्स, वैश्विक जीवनशैली और आसान बिजनेस माहौल ने उन्हें आकर्षित किया। लेकिन, हाल के भू-राजनीतिक तनावों और क्षेत्रीय अस्थिरता ने इस प्रवृत्ति पर नए सवाल खड़े कर दिए। क्या वास्तव में दुबई जैसे देशों में बसना उतना सुरक्षित और स्थायी विकल्प है जितना माना जाता है, या फिर यह केवल टैक्स बचाने और विलासितापूर्ण जीवन की चाह का परिणाम है! यह सवाल अब गंभीर बहस का विषय बन चुका है।
एक दशक में दुबई भारतीयों के लिए सबसे पसंदीदा विदेशी ठिकानों में से एक बनकर उभरा है। खासकर अमीर भारतीयों और उद्योगपतियों के बीच वहां बसने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। दुबई की रियल एस्टेट मार्केट में भारतीय निवेशकों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती गई और कई बड़े कारोबारी परिवारों ने वहां महंगी प्रॉपर्टी खरीदकर स्थायी निवास बना लिया।
इस आकर्षण के पीछे सबसे बड़ा कारण दुबई का टैक्स ढांचा है। दुबई में व्यक्तिगत आयकर नहीं है, जबकि भारत में उच्च आय वर्ग को 30 प्रतिशत तक टैक्स देना पड़ता है। यही कारण है कि कई लोग अपनी आय और संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए खाड़ी देशों में बसने का फैसला करते हैं। इसके अलावा दुबई का आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र के रूप में पहचान और अपेक्षाकृत आसान कारोबारी नियम भी लोगों को आकर्षित करते रहे हैं।
हालांकि, दुबई जाने का कारण केवल टैक्स बचाना ही नहीं है। कई उद्योगपति और कारोबारी दुबई को वैश्विक व्यापार का प्रवेश द्वार मानते हैं। मध्य पूर्व, यूरोप और अफ्रीका के बीच स्थित होने के कारण दुबई व्यापार और लॉजिस्टिक्स के लिए एक रणनीतिक केंद्र बन चुका है। इसके अलावा दुबई में लग्जरी जीवनशैली, आधुनिक शहर, बेहतर परिवहन व्यवस्था और अपेक्षाकृत तेज प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी आकर्षण का कारण हैं। कई भारतीय पेशेवर और उद्यमी मानते हैं कि दुबई में कारोबार शुरू करना और विस्तार करना भारत की तुलना में आसान और तेज है। लेकिन, हाल के समय में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने इस आकर्षण पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्रीय संघर्षों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने यह याद दिलाया है कि खाड़ी क्षेत्र पूरी तरह स्थिर नहीं है। जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो वहां रहने वाले विदेशी नागरिकों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ जाती है। ऐसे समय में कई लोग यह महसूस करने लगते हैं कि आर्थिक लाभ के बावजूद किसी दूसरे देश में स्थायी रूप से बसना हमेशा सुरक्षित विकल्प नहीं होता। इसके विपरीत भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक और अपेक्षाकृत स्थिर देश है। यहां मजबूत संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो नागरिकों को दीर्घकालिक सुरक्षा और अधिकार प्रदान करती है। भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ रही है और निवेश तथा उद्यमिता के नए अवसर लगातार सामने आ रहे हैं। स्टार्टअप इकोसिस्टम, डिजिटल अर्थव्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास ने देश को वैश्विक निवेश के लिए आकर्षक बना दिया है। ऐसे में कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए विदेश बसना हमेशा दीर्घकालिक रूप से सही फैसला नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का है। भारत छोड़कर विदेश में बसने वाले कई लोगों को समय के साथ यह महसूस होता है कि अपने समाज, संस्कृति और परिवार से दूर रहना आसान नहीं होता। दुबई जैसे देशों में भले ही भारतीय समुदाय बड़ा हो, लेकिन वहां की नागरिकता व्यवस्था और सामाजिक ढांचा अलग है। अधिकांश विदेशी नागरिकों को वहां स्थायी नागरिकता नहीं मिलती, जिससे उनका भविष्य हमेशा अनिश्चित बना रहता है। हाल के वर्षों में यह भी देखने को मिला है कि कुछ लोग विदेश में रहने के बाद वापस भारत लौटने का निर्णय ले रहे हैं। भारत की बढ़ती आर्थिक संभावनाएं, तकनीकी विकास और बेहतर जीवन के अवसर इस बदलाव के पीछे प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा किए गए कई आर्थिक सुधारों और कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने की कोशिशों ने भी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।
दरअसल, विदेश में बसना या निवेश करना कोई गलत निर्णय नहीं है। लेकिन केवल टैक्स बचाने या अल्पकालिक लाभ के लिए स्थायी रूप से देश छोड़ देना एक बड़ा फैसला होता है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। जरूरी यह है कि लोग आर्थिक लाभ के साथ-साथ सुरक्षा, स्थिरता, सामाजिक जुड़ाव और भविष्य की संभावनाओं जैसे पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करें। दुबई और खाड़ी देशों का आकर्षण अपनी जगह है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या केवल आर्थिक कारणों से विदेश बसना सही फैसला है। भारत आज तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और यहां अवसरों की कोई कमी नहीं है। ऐसे में शायद यह समय है जब लोग केवल टैक्स के नजरिए से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अपने फैसलों पर पुनर्विचार करें।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
