
रांची : झारखंड हाईकोर्ट में भूमि विवाद से जुड़े एक अवमानना मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि जब किसी अधिकारी को गलत निर्णय की जानकारी पहले से हो, फिर भी वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं की जाती, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी को दिखाता है। यह मामला जमीन मुआवजा और वंशावली से जुड़े विवाद से संबंधित है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने की सुनवाई
इस मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ में हुई। अदालत में मंशा सिंह उर्फ राजेश सिंह की ओर से दायर अवमानना याचिका पर चर्चा की गई। सुनवाई के दौरान भूमि सुधार एवं निबंधन विभाग के सचिव, रांची के उपायुक्त मंजूनाथ भजंत्री और नामकुम के अंचल अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए।
2017 के आदेश के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 24 जुलाई 2017 को मेमो संख्या 1165(ii) के तहत एक आदेश पारित किया गया था। इस आदेश को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने भी सही ठहराया था। इसके बावजूद कई वर्षों तक संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और पूछा कि जब 2017 में ही कार्रवाई की जरूरत महसूस की गई थी, तो आठ साल तक कदम क्यों नहीं उठाया गया।
अदालत ने व्यवस्था मजबूत करने को कहा
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से पूछा कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को कैसे मजबूत किया जाएगा। इस पर विभागीय सचिव ने बताया कि इस विषय पर कार्मिक, प्रशासनिक सुधार और राजभाषा विभाग के प्रधान सचिव से परामर्श किया जाएगा।
अगली सुनवाई 2 अप्रैल को
अदालत ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई में इस मामले से जुड़ा हलफनामा दाखिल किया जाए। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 2 अप्रैल तय की है। फिलहाल अदालत ने तीनों अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट दे दी है। हालांकि, आठ साल तक कार्रवाई न होने को लेकर हाईकोर्ट ने प्रशासन पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है।
