झारखंड

सुरंग में फंसे रांची जिले के इस गांव के 3 मजदूर लौट अपने घर, खुशी का ऐसा…

Ranchi Workers : रांची से 40 किलोमीटर दूर खेराबेड़ा गांव के तीन मजदूर उत्तराखंड के सिल्क्यारा सुरंग हादसे (Silkyara Tunnel Accident) में फंसे हुए थे। लगभग 20 दिनों से जिस गांव में उदासी छाई हुई थी। शनिवार को वहां खुशी का माहौल है।

पीड़ित परिवार खुशियां मना रहा है। नाच रहा है। आपस में लोग हंसी ठिठोली कर रहे हैं। सुरंग में फंसे यहां के तीनों मजदूर सकुशल घर वापस आ गए हैं। शुक्रवार की देर रात सभी अपने घर पहुंचे।

सुरंग में फंसे राजेंद्र बेदिया (Rajendra Bedia) के घर का माहौल बदला-बदला दिखा। बेटे के घर वापस की खुशी मां के चेहरे पर साफ झलक रही है। कहती है अब किसी भी हाल में वापस जाने नहीं देंगे। यहीं जो काम मिलेगा करेगा।

घर में सुबह-सुबह आदिवासी रीति-रिवाज से पूजा हुई। मां बताती है कि हमने अपने देवता से बेटे के वापसी की कामना की थी। कुछ पूजा हुआ है, कुछ होना बाकी है। मुर्गे की बलि होगी। देवता ने हमारी मन्नत सुन ली है।

राजेन्द्र ने बताया कि 600 रुपये हर दिन की मजदूरी थी, जिसमें से 150 रुपये खाना का देना पड़ता था। वह बताता है कि जिस दिन हादसा हुआ हम सभी टनल के अंदर काम कर रहे थे। तभी जोरों कर आवाज हुई।

भीतर हमलोग 41 लोग थे

पहले तो समझ नहीं आया फिर पता चला कि हम फंस चुके हैं। हादसे के दिन तो समझ नहीं आ रहा था कि क्या होगा क्या नहीं। फिर दूसरे दिन बाहर से संपर्क हुआ, तो राहत मिली।

भीतर हमलोग 41 लोग थे। इसलिए हिम्मत बनी रही। आपस में ही बातें करते। गेम्स खेलते। इस तरह हमलोग समय काट रहे थे लेकिन यह विश्वास था कि इस संकट से उबर जाएंगे।

इसी खेराबेड़ा गांव के पठार पर सुकराम बेदिया का परिवार रहता है। पिता खेतीबाड़ी करते हैं। सुकराम बताता है कि घर में खेती से कमाई होती नहीं है। गांव में भी कोई काम नहीं।

तीन साल पहले मैट्रिक पास किया लेकिन पैसे के अभाव में आगे की पढ़ाई नहीं कर सका। गांव में ही इधर-उधर घूमता था। किसी परिचित ने बताया कि बाहर काम करने चलो अच्छी सैलेरी मिल जाएगी।

मुझे भी लगा कि कुछ पैसे हाथ में आ जाएंगे तो आगे की पढ़ाई कर सकूंगा। घर की मजबूरियां भी थी तो घर छोड़ कर जाना है। पहली बार गया ही था और इस तरह का हादसा होगा।

सुकराम के घर लौटने पर सभी खुश हैं। घर में पूजा पाठ किया गया। स्थानीय गीतों पर पूरा परिवार रहा है। सुकराम बताता है कि हादसे के बाद हर दिन दिमाग में यही चल रहा था कि परिवार वाले कैसे होंगे।

हर दिन एक ही चिंता की यहां से बाहर कैसे निकला जाए। वह बताता है कि मेरी मेरे परिवार वालों से घटना के एक सप्ताह बाद बात हो पायी।

घर में सुकराम के साथ उसका साथी नरेश बेदिया भी है। वह हादसे में फंसा तो नहीं था पर बाहर ही वह अपने साथी का इंतजार कर रहा था। वह बताता है कि मेरा डे शिफ्ट था। इस वजह से हम बाहर थे।

वहां काम क्या करना था यह बताया गया था?

वह बताता है कि हम कई लोग अपने कमरे में थे। दूसरे साथियों से पता चला कि इस तरह का हादसा हो गया है। फिर हम सभी हादसे वाली जगह पर गए। वहां देखा कि काफी लोग जमा हैं।

बताया गया कि टनल धंसा हुआ है और भीतर लोग फंसे हुए हैं। वापस जाने के सवाल पर नरेश कहता है कि हम तो काम देखते हैं। यदि झारखंड सरकार हमें अपने ही राज्य में काम देती है तो फिर बाहर क्यों जाऊंगा।

खेराबेड़ा गांव घुसते ही सबसे पहला घर अनिल बेदिया का है। इसके घर के आंगन में भी लोग जुटे हुए हैं। खुशी का माहौल है। सभी अनिल को घेरे हुए हैं। अनिल बताता है कि मेरे गांव और आसपास के गांव के कई लोग बाहर काम करने जाते थे। उसी में से कई दोस्त भी थे। उन्होंने कहा कि बाहर काम करने चलोगे तो मैं चला गया।

वहां काम क्या करना था यह बताया गया था? इस सवाल के जवाब में कहता है कि काम तो बताया गया था लेकिन टनल में काम करने की बात नहीं बतायी गयी थी।

24 घंटे तक की थोड़ा डर, थोड़ी घबराहट हुई

हादसे को लेकर अनिल ने बताया कि हमलोग जहां काम कर रहे थे वहां से एक किमी दूर हादसा हुआ था। मलबा की आवाज हम तक आयी थी। वैसे वहां इस तरह की आवाज आती रहती थी।

वह कहता है कि घटना के 24 घंटे तक की थोड़ा डर, थोड़ी घबराहट हुई। तभी सब निराश ही हो गए थे कि अब क्या होगा। कई लोग तो रोने लगा था। जब बाहर लोगों से संपर्क हुआ फिर सब सामान्य लगने लगा।

अनिल बेदिया की घर वापसी के बाद परिजनों ने फूल माला और आरती से स्वागत। परिजनों ने कहा कि अब तक घर में दीपावली नहीं मनी। अब मनाई जाएगी। अनिल ने सुबह-सुबह ही अपने गांव देवता की पूजा की है।

वह बताता है कि घर वालों ने मन्नत रखी थी। उसी को लेकर बकरे की बली दी गई है। वह बताता है कि गांव में कोई काम नहीं है। यहां केवल पत्थर क्रशर है लेकिन वहां भी कुछ खास काम नहीं मिलता है।

दो साल पहले अनिल (Anil) ने 10वीं पास किया है। वह आगे पढ़ना चाहता था पर नहीं कर सका। उत्तराखंड जाने से पहले वह बेंगलुरु में काम कर चुका है। पढ़ाई करने के सवाल पर कहता है कि अब पढ़ाई नहीं हो सकेगी। बाहर जाने के सवाल पर कहता है कि फिलहाल तो नहीं जाऊंगा।

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