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साहिबगंज मामला, पहाड़िया समुदाय के अधिकारों पर हाईकोर्ट सख्त, आरोपियों को नहीं मिली राहत

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Sahibganj case : साहिबगंज जिले में पहाड़िया जनजाति के लोगों को त्योहार मनाने से रोकने, साथ ही राशन, पानी, इलाज और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित किए जाने के गंभीर मामले में High Court ने कड़ा रुख अपनाया है।

न्यायालय ने इस मामले में नामजद आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने साफ संकेत दिया कि इस तरह के मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

अग्रिम जमानत और समझौते पर कोर्ट की सख्ती

High Court ने न केवल आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की, बल्कि समझौता याचिका को भी नामंजूर कर दिया। कोर्ट का कहना था कि पीड़ित पर दबाव डालकर कराया गया समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता।

न्यायालय ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होना चिंताजनक है।

पुलिस और प्रशासन पर नाराजगी

कोर्ट ने Police और जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले की गंभीरता के अनुरूप कार्रवाई नहीं की गई।

अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून व्यवस्था से खिलवाड़ और जनजातीय समुदाय के दमन को किसी भी हाल में सही नहीं ठहराया जा सकता।

क्या है पूरा मामला

यह मामला बरहरवा थाना (Barharwa Police station) कांड संख्या 79/2025 से जुड़ा है।

आरोप है कि होली पर्व के दौरान पहाड़िया समुदाय को कथित रूप से धमकाया गया, जातिसूचक गालियां दी गईं, महिलाओं से छेड़छाड़ की गई और सामाजिक बहिष्कार जैसे कदम उठाए गए। इन आरोपों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।

प्रशासन को दिए गए सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने साहिबगंज के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया है कि वे पहाड़िया समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करें।

साथ ही, खाद्यान्न, पेयजल, चिकित्सा सुविधा और अन्य आवश्यक सेवाएं तुरंत उपलब्ध कराने को कहा गया है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

राज्य स्तर पर निगरानी का आदेश

न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और संबंधित विभागों को साहिबगंज जिला और दुमका प्रमंडल में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने साफ कहा कि जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा राज्य की जिम्मेदारी है।

छात्र नजरिया

एक छात्र के रूप में देखा जाए तो यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश जाता है कि कानून सबके लिए बराबर है और कमजोर समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका पूरी तरह सजग है।

यह मामला समाज में समानता और इंसाफ की सोच को मजबूत करता है।

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