
प्रभाकर मणि तिवारी
हाल में पटना में दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा से मेरी दशकों पुरानी यादें जुड़ी हुई हैं। हम गुवाहाटी से निकलने वाले पूर्वांचल प्रहरी में तो साथ थे ही। कोलकाता के जनसत्ता संस्करण में हमारी नौकरी एक ही दिन लगी थी।
दरअसल,कोलकाता संस्करण निकलने से पहले मुझे इसके गुवाहाटी संवाददाता के तौर पर काम करने का ऑफर मिला था। लेकिन मैंने कहा कि सिलीगुड़ी में रखें तो मुझे मंजूर है. उसके बाद मुझसे गुवाहाटी के लिए किसी का नाम सुझाने को कहा गया था। मैंने तब अमरनाथ का नाम सुझाया था।
हमलोग सिलीगुड़ी से एक साथ ही जनसत्ता का इंटरव्यू देने कोलकाता पहुंचे थे। उस समय प्रेसीडेंसी कॉलेज में पढ़ने वाले छोटे भाई के साथ। वजह—उसके हिंदू हास्टल में मुफ्त रहने का इंतजाम हो जाता और होटल का खर्च नहीं लगता।
हम सुबह की ट्रेन से चलकर शाम को कोलकात्ता पहुंचे और अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में। कुछ देर इंतजार के बाद पता चला कि प्रधान संपादक प्रभाष जोशी की तबियत कुछ नासाज है और वो ग्रांड होटल में ही मुलाकात करेंगे। खैर, हम वहां पहुंचे औरऔपचारिक बातचीत के बाद होटल के नोट पैड पर ही प्रभाष जी ने हाथ से लिख कर ऑफर लेटर थमा दिया। यानी हमारी नौकरी एक ही दिन लगी थी।
जनसत्ता में नौकरी मिलने पर खुश होना स्वाभाविक था। लेकिन अमरनाथ की तो खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने रात को मुझे और मेरे भाई को खाना खिलाया था।
खैर, मैंने जनसत्ता में करीब 28 साल लंबी पारी खेली। सिलीगुड़ी, गुवाहाटी और कोलकाता में। अमरनाथ भी गुवाहाटी के बाद पहले कोलकाता और फिर चंडीगढ़ के बाद दोबारा कोलकाता घूमते रहे। यहां से दिल्ली तबादला होने के बाद उन्होंने वीआरएस ले लिया था।उनके असामयिक निधन की खबर सुन कर अक्तूबर, 1991 का वह वाकया किसी रील की तरह आंखों के समक्ष सजीव हो उठा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

