
नई दिल्ली : भारतीय मुद्रा के लिए पिछला सप्ताह ऐतिहासिक उथल-पुथल वाला रहा। 30 मार्च को अंतर-दिवसीय कारोबार के दौरान भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.22 के अब तक के सबसे निचले (Historic Low) स्तर पर जा गिरा। हालांकि, 4 अप्रैल तक रिजर्व बैंक के दखल से स्थिति में कुछ सुधार हुआ है और रुपया 92.98 के करीब कारोबार कर रहा है, लेकिन इस झटके ने देश की आर्थिक सेहत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुद्रा की गिरती कीमत केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश की क्रय शक्ति और वैश्विक साख का आईना है। जब रुपया टूटता है, तो इसका सीधा असर आपकी रसोई के बजट से लेकर देश के आयात बिल तक पर पड़ता है।
आइए समझते हैं कि आखिर रुपया इस चक्रव्यूह में कैसे फंसा।
1. कच्चे तेल का उबाल : भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। भारत को इस महंगे तेल का भुगतान करने के लिए भारी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। जब बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ती है, तो रुपये की कीमत गिरना तय है।
2. विदेशी निवेशकों (FIIs) की बेरुखी : अनिश्चितता के माहौल में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से हाथ खींचना शुरू कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, मार्च महीने के अंत तक एफआईआई ने करीब 1.04 लाख करोड़ रुपये की इक्विटी बेची है। जब ये निवेशक अपना पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे भारतीय करेंसी रक्षात्मक स्थिति में आ जाती है।
3. अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मजबूती : युद्ध और वैश्विक तनाव के समय निवेशक जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश की तलाश करते हैं। अमेरिकी डॉलर को दुनिया की सबसे सुरक्षित ‘रिजर्व करेंसी’ माना जाता है। वैश्विक अनिश्चितता के कारण पूरी दुनिया में डॉलर की मांग बढ़ी है, जिससे अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले यह और शक्तिशाली हो गया है।
अर्थव्यवस्था पर असर: कौन जीतेगा, कौन हारेगा ?
रुपये की गिरावट का असर सूक्ष्म और व्यापक, दोनों स्तरों पर होता है। महंगाई का बढ़ता दबाव: रुपये के कमजोर होने का सबसे बड़ा डर ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ (आयातित महंगाई) है। भारत कई जरूरी चीजें जैसे कच्चा तेल, खाद और इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे आयात करता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो ये चीजें महंगी हो जाती हैं। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिससे अंततः फल, सब्जियां और अनाज के दाम बढ़ जाते हैं।
व्यापार घाटे में वृद्धि: जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी के विजयकुमार के अनुसार, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और रुपये की गिरावट भारत के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को बढ़ा रही हैं। यह स्थिति लंबे समय में राजकोषीय घाटे पर दबाव बनाती है।
RBI का हस्तक्षेप और सुधार की कोशिश
30 मार्च को 95.22 के स्तर पर पहुंचने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने तुरंत मोर्चा संभाला। आरबीआई के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद रुपये में करीब 156 पैसे की रिकवरी देखी गई।
क्या है RBI का एक्शन प्लान?
आरबीआई ने बैंकों को ‘ऑनशोर फॉरवर्ड मार्केट’ में सट्टेबाजी रोकने के लिए कड़े निर्देश दिए। बैंकों की नेट ओपन पोजीशन को प्रति दिन 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दिया गया। इस कदम से बाजार में डॉलर की कृत्रिम मांग कम हुई। इसे तकनीकी भाषा में ‘शॉर्ट-स्क्वीज’ कहा जाता है, जिसने सट्टेबाजों को डॉलर बेचने पर मजबूर कर दिया और रुपये को कुछ राहत मिली।
