सरहुल संस्कृति,सामाजिक एकता, प्रकृति और आस्था का अद्भुत पर्व: संजय सर्राफ

सरहुल पर्व प्रकृति, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है, जहां आदिवासी समाज साल वृक्ष की पूजा कर पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक जीवन के महत्व को दर्शाता है।

Archana Ekka
4 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

रांची : हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में आदिवासी समाज का विशेष स्थान है, जहां प्रकृति को ही ईश्वर का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है।

इन्हीं प्रमुख पर्वों में से एक है सरहुल, झारखंड और आसपास के इलाकों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है।

यह उत्सव प्रकृति की पूजा और उसके संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। सरहुल के दौरान साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक नृत्य, गीत और सामुदायिक भोज का विशेष महत्व होता है। इस पर्व के माध्यम से लोग प्रकृति, सूर्य और पृथ्वी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

सरहुल का त्योहार खासतौर पर झारखंड के उरांव, मुंडा, और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर गांवों में खुशी और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। सरहुल पर्व वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है जब सखुआ (साल) वृक्ष में नए फूल खिलते हैं। सरहुल पर्व चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है।

इस वर्ष सरहुल 21 मार्च को मनाया जाएगा। यह पर्व प्रकृति, विशेषकर वृक्षों और धरती माता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। आदिवासी समाज मानता है कि धरती और वनस्पति ही जीवन का आधार हैं, इसलिए उनकी पूजा करना मानव का कर्तव्य है। सरहुल का अर्थ ही होता है “सरई (साल) के फूलों की पूजा”।

इस दिन साल वृक्ष के फूलों को पवित्र मानकर पूजा की जाती है।

सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला उत्सव है। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। आदिवासी समाज का मानना है कि यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे, तो जीवन भी सुरक्षित रहेगा। इस दिन लोग वर्षा, अच्छी फसल और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

सरहुल सामाजिक एकता और सामूहिकता का भी प्रतीक है। गांव के सभी लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं,नृत्य-गीत करते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाते हैं।

यह पर्व पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है।सरहुल पर्व से जुड़ी एक प्रमुख कथा के अनुसार, धरती माता और सूर्य देव के मिलन से सृष्टि का निर्माण हुआ। इस मिलन का प्रतीक ही सरहुल पर्व है।

आदिवासी समाज के पुजारी, जिन्हें ‘पाहन’ कहा जाता है, इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। वे गांव के सरना स्थल (पवित्र उपवन) में जाकर साल वृक्ष के फूलों से पूजा करते हैं और प्रकृति देवता से आशीर्वाद मांगते हैं।

पूजा के बाद पाहन गांववासियों को प्रसाद के रूप में साल के फूल और पवित्र जल वितरित करते हैं। इसके बाद पूरे गांव में पारंपरिक नृत्य और गीतों का आयोजन होता है, जिसमें महिलाएं और पुरुष रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनकर भाग लेते हैं।सरहुल पर्व आदिवासी संस्कृति की जीवंतता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकता का अद्भुत उदाहरण है।

यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के बिना मानव जीवन संभव नहीं है, इसलिए उसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। आज के आधुनिक युग में, जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता और प्रासंगिकता है।

Share This Article
अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।