
– विवेकानंद सिंह कुशवाहा
अपनी सामाजिक ताकत, व्यवस्थागत हैसियत और जातिगत संख्या का गुमान करने वालों को बिहार के मुख्यमंत्री चाचा ‘नीतीश कुमार’ की एक फोटो अपने घर की दीवार में लगा कर रख लेनी चाहिए। इससे याद रहेगा कि अगर आप अपने ‘दिमाग’ के मैक्सिमम यूटीलाइजेशन के साथ अपने प्रोफेशन को जीना सीख लें, तो आपको उस काम में कोई हरा नहीं पायेगा। कल नीतीश चाचा समृद्धि यात्रा के अंतिम पड़ाव के तौर पर नालंदा और पटना की सभाओं को संबोधित करेंगे। इसके बाद उम्मीद की जा रही है कि वह इसी सप्ताह विधान परिषद की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे। फिर बिहार में नयी सरकार के गठन की प्रक्रियाएं प्रारंभ होंगी।
1985 में विधानसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद से राजनीति की डगर पर नीतीश जी अनवरत उंचाइयां छूते रहे। 1989 में लालू प्रसाद यादव को बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाना हो या 1990 में उनको मुख्यमंत्री बनवाना हो, इसमें चाचा नीतीश कुमार के दिमाग की अपनी भूमिका थी।
लालू जी के एकमेव जयते के चलते 1994 तक जनता दल की बिहार इकाई में भूचाल आ चुका था और 14 सांसदों के एक गुट ने जॉर्ज साहब के नेतृत्व में जनता दल (जॉर्ज) का गठन किया। हालांकि, यह बात जल्दी ही समझ आ गयी कि बिहार की राजनीति का चेहरा जॉर्ज साहब नहीं हो सकते। उसके बाद नीतीश कुमार के चेहरे को सामने रख कर वही पार्टी बनी समता पार्टी। उसमें जनता दल के साथ कांग्रेस से भी लोग आये। कांग्रेस से आये शकुनी चौधरी जी।
1995 में समता पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा और बुरी हार का सामना करना पड़ा। सिर्फ सात विधायक जीत सके। पार्टी की हार के बाद नीतीश चाचा ने अपना दांव बदला और 1996 में भाजपा के साथ गठबंधन किया। 1998 में समता पार्टी से भी अच्छी संख्या में सांसद बने और अटल जी की 13 महीने वाली सरकार में नीतीश चाचा मंत्री बने। फिर 1999 में भी NDA को बड़ी जीत मिली और पांच वर्षीय सरकार बनी। उस दौर में जब वह अपनी बात रखते तो क्या गजब की क्लेरिटी होती उनकी बातों में। इसी क्लेरिटी ने उनको बिहार की राजनीति का और भी बड़ा चेहरा बनाया।
इधर बिहार में लालू जी जेल जा चुके थे और सीएम की कुर्सी पर सवार थीं राबड़ी जी। वर्ष 2000 में नीतीश चाचा को सात दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनने का मौका तो मिला, पर सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी, पर राजनीति की नयी राह खुल चुकी थी। 2003 में समता पार्टी और शरद जी की पार्टी के मेल से जदयू का उदय हुआ। 2005 के पहले चुनाव में असेंबली हंग हो गयी। राष्ट्रपति शासन की भी नौबत आयी।
2005 के दूसरे चुनाव में वह पड़ाव आया, जब नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने वह आशीर्वाद दिया, जिसकी उनको जरूरत थी। 1985 में विधायक बनने के 20 साल बाद उन्होंने राजनीति की नयी धारा में प्रवेश किया। आज नवम्बर 2005 में मुख्यमंत्री बनने के 20 साल बाद 2026 में वे पुनः राजनीति की एक नयी धारा की तरफ बढ़ रहे हैं।
2005 में नीतीश चाचा के आगे सिर्फ चुनौतियां ही चुनौतियां थीं। सड़कों से लेकर समाज तक सब टूटे हुए थे। बिजली का दर्शन दुर्लभ था। रोजी रोजगार की जगह कट्टा रोजगार था। फिर शुरू हुई नीतीश नीति। आद्री जैसी संस्थाओं का सहयोग मिला। अधिकारी से कर्मचारी तक के व्यवहार को बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। सड़कों के निर्माण पर पूरा जोर लगाया गया। रैपिड एक्शन फोर्स का एक्शन दिखने लगा।
2005 से 2010 के पांच वर्ष में बिहार में हुए बदलाव ने विपक्षी दल के समर्थकों को भी अचंभित कर दिया। NDA को 2010 में बम्पर जीत मिली। इसमें यह भी जिक्र करना जरूरी है कि केंद्र की यूपीए-1 की सरकार मनरेगा जैसी स्कीम लेकर आयी थी। ग्रामीण विकास विभाग के तहत भी अच्छी राशि आयी।
2013 के बाद नीतीश चाचा ने अपनी राजनीतिक दांव को आजमाने की कोशिश की। जब तय हुआ कि 2014 में भाजपा से पीएम फेस मोदी जी होंगे, तो उन्होंने भाजपा से अलग होने का फैसला कर लिया। उन्हें लगा मुस्लिम उनके साथ आयेंगे। वर्ष 2010 में मिली बंपर जीत से नीतीश चाचा को लगा था कि बिहार के हर तबके ने उनको अपना नेता मान लिया है, लेकिन 2014 के परिणाम ने उनकी इस सोच को धक्का दिया। न मुस्लिम साथ आये, न सवर्ण। नीतीश चाचा ने शतरंज के घोड़े की तरह ढाई कदम खुद को पीछे कर लिया और नैतिक आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, एक साल बाद वह फिर से सीएम बने।
फिर 2015 में वह हुआ, जो खासकर बिहार के लालू जी विरोधियों के लिए इलेक्ट्रिक शॉक की तरह था। जनता परिवार के दो बिछड़े बंधु एक साथ आये और बिहार में राजद का फिर उदय हो गया। लालू यादव के विरोध के नाम पर वोट करने वाले लोगों के लिए यह एक ऐसा झटका था, जो उन्हें बर्दाश्त नहीं हो रहा था।
नीतीश चाचा भी उन्हें यही एहसास कराना चाहते थे, अंततोगत्वा चाचा 2017 में भाजपा के साथ लौट आये और फिर से भाई लोगों ने राहत की सांस ली। 2019 के लोकसभा चुनाव में तो परिणाम शानदार रहे, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू के साथ हुए परोक्ष छल और चुनाव परिणाम ने नीतीश चाचा को आहत तो किया, पर चाबी उनके हाथ में ही दी।
नीतीश चाचा के काम करने का एक खास तरीका रहा है। वह अपने काम में किसी का हस्तक्षेप या सफोकेशन बर्दाश्त नहीं करते। आपसे सलाह जितना ले लें, करेंगे वही जो उनको ठीक लगता है। भाजपा ने नीतीश जी के साथ रही सुशील जी की जोड़ी तोड़ने की कोशिश कर दी थी। नतीजा यह हुआ कि भाजपा और जदयू की जोड़ी फिर से टूट गयी।
फिर कोशिशें हुई विपक्षी एकता की, लेकिन कांग्रेस को समझ नहीं आया कि नीतीश जी की क्या वेल्यू है। अंततः चाचा फिर भाजपा के साथ आये और उनके साथ डिप्टी सीएम बने सम्राट चौधरी। सम्राट जी विपक्ष में रहते हुए चाचा पर हमलावर जरूर थे, लेकिन साथ आते ही उन्होंने नीतीश चाचा के सम्मान का सदैव ध्यान रखा। अक्सर सम्राट जी के विरोधी उनकी शैक्षणिक योग्यता को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनको नहीं पता कि सम्राट जी की सीखने की क्षमता अद्वितीय है। उन्होंने बिहार के बीते चार मुख्यमंत्री के बहुत करीब रह कर काम किया है।
नीतीश चाचा ने पाया कि यह बंदा भी बिहार के काम के लिए 18 घंटे काम पर लगा रह सकता है। सम्राट जी ने कभी अपनी सीमा रेखा लांघने की कोशिश नहीं की। पुराना रिश्ता तो रहा ही है। यही कारण है कि चाचा भरोसे के साथ सीएम की कुर्सी छोड़ने का मन बनाये होंगे। क्योंकि, कुल 10 बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश चाचा को सीएम की कुर्सी से कोई हटा नहीं सकता, जब तक कि वह स्वयं नहीं चाह लें। जनता ने सदैव उनको कुर्सी की चाबी भी सौंपी।
नीतीश चाचा ने निशांत भाई की राजनीति में एंट्री के मद्देनजर भी अपनी कुर्सी छोड़ने का फैसला किया होगा, ताकि कोई उन पर आरोप न लगा सकें कि बेटे को अपने साथ सरकार में जगह दे दी। चाचा सरकार से हटेंगे, तभी निशांत जी आयेंगे। चाचा अब राज्यसभा में जा रहे हैं, उनको भविष्य की राजनीतिक यात्रा के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।
बाकी त जे है से हइये है!
